मन अशांत है। बेचैन
है। ऑफिस में पांच साल होने जा रहे है। यूपीए 2 हमारे सामने आई थी इसी चैनल में,
कार्यस्थल दूसरा था। काम के हिसाब से देखा जाए तो थोड़ा बहुत ही काम सीखने को
मिला। किसी से अपनी व्यथा कह भी नहीं सकते। बस.. काम किए चले जा रहे है.. एक ही
तरह का। कहते है ना आपकी तरक्की सिर्फ आप पर निर्भर नहीं करती, इसके लिए पूरी
कायनात का साथ देना भी जरूरी है.. आपके सहकर्मी, आपके वरिष्ठ, आपके बॉसेज... आपका
काम, काम का स्वरूप, काम का क्राइटेरिया... सब चीज आपके फेवर में होना जरूरी है,
लेकिन आपको याद दिलाया जाएगा- गीता का सार – काम करता चल, फल की चिंता क्यूं करता
है। कर तो रहे है भई। कोई देख नहीं रहा है- ऐसा नहीं है। ऊपरवाला, ऑफ-कोर्स सब कुछ
देख रहा है। लेकिन किस तरह चीजों को जस्टीफाई कर रहा है- ये उसके हाथ में ही है।
हम कोई सवाल नहीं उठा रहे है। लेकिन एक किक तो मिलनी चाहिए। शैक्षणिक स्तर पर कुछ
करने की सोचे तो रास्ता ही नहीं खुल रहा। एक परीक्षा जो है, पास ही नहीं हो पा रहे
है। ऑबजेक्टिव ने तो पूरी ऑबजेक्टिविटी की झंड कर रखी है। खुद एक ऑबजेक्ट बन कर
रहे गए है। न्यूटन का पहला नियम लगा पड़ा है। एक जगह से हिल ही नहीं पा रहे है।
पता नहीं मेडियोक्रिटी से ही जिंदगी सटक रह गई। लेकिन ऐसी स्थिति नहीं है। चीजें
बदलेंगी। चीजें बदलने के लिए होती है। कायनात को भी हमारा साथ देना होगा। दीवार पर
टंगे कैलेंडर की तरह ही एक जगह, महीने के बदलने के अलावा, टंगे नहीं रह जाना है।
नहीं तो साल भर बाद उसी कैलेंडर की तरह फेंक दिए जायेंगे। तो इनोवेट करना जरूरी
है। नवप्रवर्तन। एक नया करने की सोच जन्म ली है। रूकावटें.. अड़चने आ रही है।
लेकिन सब बाधाओं से लड़कर एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ना होगा। कर शपथ.. कर शपथ..
बढ़ेंगे जीवन के अग्निपथ पर। (2355)
Sunday, March 23, 2014
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