Thursday, January 5, 2017

18 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                    'एकला चलो रे'- यह बांग्ला गीत जब गांधीजी ने आजादी से पहले हुए दंगों के दौरान दंगा प्रभावित क्षेत्रों के सड़कों पर गाते हुए आगे बढ़ रहे थे तो उस समय उनकी जो मानसिकता थी- उसी से लगभग मुझे गुजरना पड़ रहा है। वहां परिस्थितियां भयावह और एक बड़े स्तर पर थी पर यहां ऐसी बात नहीं है और न हीं समस्याएं उतनी बड़ी है। सिर्फ एक ही नहीं दो-तीन संदर्भों में हम ऐसी बातें कर सकते है, लेकिन स्थिति क्या होगी? वहीं ढ़ा के तीन पात। अब शुरू करते है आज की बात। दिन की हुई वैसी ही शुरूआत। लेकिन कल से गति में कमी थी। ग्यारह बजे विश्वविद्यालय जाना कारण था। साढ़े ग्यारह से शुक्ला सर की एक घंटी हुई। वहां से एक मित्र के साथ हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय जाकर किताबें खरीदने का कार्य हुआ। वापस लौटने पर भोजन। फिर लंबा रेस्ट। चार बजे से थोड़ी चेकिंग, कपड़े पर लोहा। वीरवार बाजार से कुछ सामानों की खरीददारी के बाद वापसी। फिर फ्लैटजन्य समस्या के कारण दस बजे तक कुछ क्रिएटिव कार्य न हो सका। भोजनोपरांत पानी लाना फिर जाकर कुछ पठन-पाठन। फिर मध्य रात्रि के करीब मैं हुआ तुम्हारे करीब। ऊपर की शुरूआत कुछ भारी-भरकम नहीं लग रही है.. अरे यार ऐसी कोई बात नहीं है। कुछ समस्याएं तो जरूर आयी है, लेकिन जिनके कारण आयी है- यह भी स्पष्ट है। अरे भाई... मेरे कारण ही आयी है और मुझे ही हल ढूंढना है। हल सही-सही ढूंढ सकूं... इस वादे के साथ शब्बा खैर...
- नितेश

17 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज से नवरात्रा प्रारंभ है। आज से नौंवे दिन तक मां दुर्गा की विशाल पूजा व अराधना की जाएगी। फिर दसवें दिन विजयादशमी का त्योहार है। वैसे दिन की शुरूआत सामान्य दिनों की ही भांति हुई। बस पूजा-पाठ के कार्यक्रम में थोड़ी सी अभिवृद्धि करनी पड़ी। उसके पश्चात नाश्ता फिर नौ पांच वाली बस आज पकड़ा गई। विश्वविद्यालय पहुंचे। प्रथम दो क्लासेज मोनिका जुनेजाजी की थी, वो अनुपस्थित थी। अतः उस समय पाठ्यक्रम संबंधी बातों पर कुछ मित्रों से विचार-विमर्श हुआ। कुछ पाठ्यसामग्री की फोटोकॉपी भी करवायी। फिर साढ़े ग्यारह बजे वाली क्लास नज़फ हैदर सर की थी। अस्सी-नब्बे मिनट के लेक्चर को सुनने के बाद पौने दो तक घर वापसी हुई। भोजनोपरांत आराम करने के विचार से गए। पांच बजे तक सोना हो गया। उठने के बाद थोड़ी क्रिकेट फिर सात से नौ पढ़ाई। फिर भोजन। फिर लेखन। आज पूर्व दिनों जैसी स्थिति नहीं है क्योंकि इससे पहले जब भी मैं लेखन कार्य हेतु आता तो आंखे बोझिल होती या कुछ देर बाद निश्चित रूप से सोना होता लेकिन आज तो ऐसी स्थिति है कि इसके पश्चात भी कुछ कार्य किया जा सकता है। बात करें आज थोड़ी विश्वविद्यालीय पढ़ाई की। पढ़ाई तो एकदम फर्स्ट क्लास हो रही है, लेकिन बहुत सारे छात्रों के साथ समस्या, पाठ्यक्रम, परीक्षा संबंधी तथ्यों की अनभिज्ञता है। अभी तक सत्तर प्रतिशत छात्रों की स्थिति एवरेज वाली है। मैं भी उसी में से हूं। एक वाइड और एक्सटेंसिव स्टडी की जरूरत है। यहां आकर लगता है हमनें शून्य को भी एचीव नहीं किया। आपको- शुभ रात्रि। मैं कुछ करने के मूड में है... अच्छा अलविदा।
- नितेश

16 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज की दिनचर्या पूर्व की भांति ना होकर थोड़ी व्यस्त थी। सुबह उठने के साथ ही शाखा, फिर लौटनेत वक्त दूध-दही व सब्जी फिर नौ बजे तक पूरी तरह से तैयार। साढ़े नौ तक विश्वविद्यालय पहुंचना था लेकिन बस के कारण दस मिनट की देरी हुई फिर भी दो क्लासेज लगातार हुई। पहली पूरी सौ मिनट अरूप बनर्जी सर ने ली फिर दूसरी क्लास पचास मिनट की शर्मा सर ने ली, फिर वहां से महाविद्यालय परिचय-पत्र हेतु गये, लेकिन पहुंचते-पहुंचते वहां लंच टाइम हो गया अतः इंतजार करने के पश्चात उससे संबंधित अधिकारी से मिले, उन्होंने अगले सप्ताह का समय दिया। वहां से घर वापस आये पांच बजे। भोजनोपरांत थोड़ी देर बाहर  बरामदा में  बैठे। फिर एक मित्र को लेकर औषधालय गए। वहां से मंदिर से भी होकर आ गए। आने के पश्चात कुछ देर तक पत्रों के पन्नों को पलटे। फिर किताब हेतु बाहर निकले लेकिन वापस एक बार आने के बाद फिर वहीं पुस्तक दूसरे जरिए से मिली। घर लौटने पर भोजन फिर हाल-चाल लेखन। पूरा दिन एक तरह से व्यस्तता से घिरा रहा। अभी कुछ दिनों तक वह गति नहीं आ सकती, जिस गति की आवश्यकता है, लेकिन उस दिशा में कार्य करना जरूरी है। महती कार्यों के बीच अपना संतुलन बनाये रखना- वह भी मानसिक संतुलन एकदम जरूरी होता है। जिससे कि आने वाली बाधाओं से भी आसानी से निपटा जा सकता है। इसलिए एक-एक दिन इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपने संतुलन बनाए रखकर कितना एचीव किया। अच्छा देता हूं कलम को विश्राम... आपको राम-राम।
- नितेश

15 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आधी रात होने को आयी, तब मैं यहां आ रहा हूं। आज तो निश्चय ही तुम्हें मिस कर जाता, लेकिन अभी तुरंत पानी लाने के पश्चात जैसे ही हिसाब कर रहा था एक दूसरी डायरी में तो मुझे तुम्हारी याद आयी, सो चला आया- तुमसे एक संक्षिप्त वार्ता करने के लिए। आज का कार्यक्रम पूर्व की भांति न होकर बदलाव लिए हुए था। साढ़े चार में पूर्ण रूप से उठने के पश्चात पौने छः में घर से निकला और छः पच्चीस में स्टेशन पर था। वहां तुरंत रेलगाड़ी आई और चाचा राजकुमारजी से भेंट हुई। वहां से उनके द्वारा सामान, पत्र व पैसा लेने के पश्चात वापस घर पर आया, फिर घर से महाजलाभिषेक हेतु श्री सदगुरूधाम मंदिर गया। वहां से लौटने के पश्चात नाश्ता किया, फिर महाविद्यालय जाने का विचार था लेकिन सुबह के ह्रासमेंट के कारण विचार त्यागना पड़ा। फिर शरीर को आराम पहुंचाने के लिए शयन किया गया। राजेशजी पांच बजे हैप्पी बर्थडे की तस्वीरें लाकर मेरे निद्रा के क्रम को तोड़ा। हंसी-मजाक, जलेबी मेरठवाले की चली। फिर हुआ पढ़ाई का कार्यक्रम । फिर भोजन, फिर नींद जोर से आ रही थी फिर भी बत्रा गये, वहां से जल लाये। ये तुम कहोगी क्या पानी लाये... पानी लाये की रट लगाये हुए हो। अरे भाई बात ऐसी है कि पानी के मामले में यहां पर सावधानी बरतनी पड़ रही है। अच्छा.. ओके जोरों से नींद आ रही है। जा रहा हूं जस्ट सोने। शुभ रात्रि।
- नितेश

14 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज रविवार है.... यानि की था। मेरे लिए तो वैसे रविवार पूर्णतया छुट्टी का दिन होता है, लेकिन इस बार ऐसा महसूस हुआ नहीं क्योंकि विश्वविद्यालय में ऑटम वैकेशन चल रहा है और पूरा पखवाड़ा यूं ही बीता। खैर... अब अगले संडे को ऐसा महसूस होगा तब मजा आएगा। वैसे आज भी सुबह के कार्यक्रम पूर्व की भांति चले लेकिन सफाई कार्यक्रम जोरों पर चला। सभी काम करने के पश्चात आज केंद्रीय भंडार सामान लाने गए। फिर लौटने के पश्चात वहीं शून्यता। कोई कंस्ट्रक्टिव वर्क नहीं। शाम में मोबाइल से पिताश्री से बात हुई। सूचना मिली कि राजू चाचा कल आ रहे है, तो उनसे कुछ सामान व मुद्रा लेने कल स्टेशन जाना होगा अतः सुबह के दो लगातार कार्यक्रम हो गए जिस कारण प्रातः जल्दी उठना होगा। फिर रात्रि भोजन के पश्चात... यहां अध्ययन कक्ष में। कल तो कुछ व्यस्तताएं भी थी, लेकिन आज एकदम खाली-खाली सा दिन बीता। फिर कल व्यस्त कार्यक्रम रहेगा। और.. परसों से तो विश्वविद्यालय पुनः खुल रहा है। मैंने इन छुट्टियों को कोई सदुपयोग नहीं किया। तुम पूछोगी... ऐसा क्यों? अरे भाई... ऐसा अपना बैकग्राउंड ही है। कभी सिंसियर नहीं रहे। लेकिन अब नहीं तो कभी नहीं। अतः जल्द ही इस दिशा में एक सार्थक एवं उचित कदम उठाना पड़ेगा। कुछ करें या ना करें... ऐसा सोचना अब बेकार होगा। एक ऑडेसियस स्टेप उठाना होगा चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये। ओके चलता हूं.. बत्रा.... फिर आकर सोऊंगा।
- नितेश

13 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज जब मैं सुबह उठा तो सूरज सिर पर चढ़ आया था। यह कल रात की थकान, जो कि कंसर्ट के कारण हुई, का नतीजा था। सुबह उठकर शौच कर्म व स्नान कर श्रीसद्गुरूधाम मंदिर जाना हुआ, वहां पर एक सूचना लिखनी थी, जिसे लिखकर मैं साढ़े दस के करीब घर पर लौटा और फिर नाश्ता कर सोने को चला गया। थकान गजब की थी। फिर ढ़ाई बजे उठने के पश्चात भोजन किए, फिर शुरू हुआ चिकित्सा केंद्रों में जाने का सिलसिला। पहले एक मित्र को लेकर डॉ. सिंह के यहां गये वहां पर संपर्कोंपरांत देवीज डायग्नॉस्टिक सेंटर गए वहां उसी मित्र का अल्ट्रासाउंड कराना था। समय साढ़े पांच का मिला। लौटने के पश्चात वस्त्रों में आयरन कराने गए फिर एक दूसरे मित्र को लेकर डॉ. मोंगा के पास गये वहां से लौटने के तुरंत बाद पूर्व उल्लिखित केंद्र पर जाना पड़ा। चिकित्सक साहब की देरी की वजह से वहां कार्य साढ़े सात तक संपन्न हुआ। वापस होने पर एक घंटे पढ़ाई का काम चला, फिर  भोजन, फिर उठानी पड़ी लेखनी, तुम्हें, आज क्या हुआ- यह बताने के लिए। फिर एक कार्य करने के पश्चात होगा सोने का उपक्रम। फिर होगी- एक मीठी रात, फिर उत्साहित, उल्लिसित सबेरा। ज्यों-ज्यों छुट्टियां बीतती जा रही है- एक अनजाना, अनदेखा भय समा रहा है। इससे भयभीत एकदम नहीं हूं बल्कि यह कर्तव्यबोध करानेवाला है। एक सुनिश्चित भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो- यही मेरी भगवान से प्रार्थना है। अच्छा बहुत हो गयी बातें। शुभ रात....।
- नितेश

Wednesday, January 4, 2017

12 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     कल मेरे द्वारा की गयी लंबी बस यात्रा का प्रभाव आज सुबह देखने को मिला। उठने का मन नहीं हो रहा था फिर भी शाखा जाना हुआ फिर वहां से संपर्क हेतु जाना पड़ा। स्नान में देरी कुक के इंतजार के कारण हुई फिर पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम को टालते-टालते आखिरकार टालना ही पड़ा। दोपहर में भोजन-निर्माण के पश्चात, ग्रहण करने के बाद धौलाकुंआ मित्र के यहां पहुंचे फिर शिव मूर्ति के निकट पहुंचे, जहां विश्व के सर्वाधिक तेज की बोर्ड प्लेयर अदनान सामी और शंकर महादेवन का कंसर्ट था। अंतिम क्षणों में कंसर्ट का आनंद लिया गया। साढ़े दस तक कंसर्टोपरांत हम एन एच-8 पर थे और साढ़े बारह तक घर पर। मिलाजुला कर दिन ठीक बीता। पठन-पाठन संबंधित कुछ कार्य न हो सका, ऐसा स्वाभाविक था क्योंकि मेरे लिए भोर का तारा ही पूरे दिन को बतला डालता है। मुझे बचपन में पढ़ी एक कविता याद आ रही है, भले ही उस समय हमलोग जोश में उस कविता का पाठ कर लिया करते थे, लेकिन उसमें निहित दर्शन को हम लोग आज समझ रहे हैं। कविता है- ' ये जीवन क्या है? निर्झर है, बहना ही इसका पानी है, सुख-दुख के तीरों से टकराता चल रहा मनमानी है।' कविता मैंने यहां शब्दशः नहीं रखा है, फिर भी इसी प्रकार कविता थी। तो मेरे कहने का अभिप्राय है- हमें निर्झर की तरह होना चाहिए, सदा गतिमान। क्योंकि जैसे ही जीवन की  गति में थोड़ी सी कमी आती है या रुकने जैसे हो जाता है, बड़ा बोरिंग लगता है। अच्छा ओ के चलता हूं, कल फिर मिलेंगे... शब्बा खैर।
- नितेश

11 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     कल जो मैंने प्रश्न उठाया था पहली पंक्ति में, उसका उत्तर स्वयं ढूंढ़ने की कोशिश की, कुछ हद तक सफलता मिली। सुबह उठने के पश्चात जब मैं शौचालय से लौटा तो एक मित्र द्वारा चिकित्सक के विषय में पूछा गया कि कोई से जान-पहचान है क्या? मैंने अग्रवाल साहब की बात की और शाखा चला गया। वहां शाखा पर जब मैं था तो दूसरे मित्र की सहायता से वह मित्र वहां आया, मौके की नजाकत को देखते हुए उसे वहीं डॉ. सिंह के यहां दिखलाया गया। शाखा के अन्य स्वयंसेवकों द्वारा वहां आकर यह जाना कि हमारे लिए कोई सेवा- निश्चय ही एक बड़े सांगठनिक बल की ओर इशारा करता है। उसके बाद वही दिनचर्या। दस बजे मनन जानने के क्रम में बस में मो. एस. अनवर द्वारा रखी गयी बातें मन को झकझोर गयी। फिर देर-सबेर यानी एक बजे तक मनन पहुंचा। भोजनोपरांत शुरू हुआ अजस्रधारा का प्रवाह। वहां पर मैंने पाया कि एक ऐसे बौद्धिक क्षमता का विकास उन लोगों के द्वारा कर लिया गया है कि वे एक नामी इतिहासकार को चुनौती देने में नहीं हिचकते। तत्पश्चात एक मित्र द्वारा मेरे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की जानकारी ली गयी, फिर उनके द्वारा हुआ दिशा-निर्देशन। मनन में एक पाठ पढ़ने के लिए मन को लगाना पड़ा। पुनः वापस लौटने के क्रम में सदर से एक समतापी बर्तन की खरीददारी में लगभग दो घंटे क्षय हुआ। घर लौटने पर भोजन, तत्पश्चात शीतल पेय। फिर तुम्हारे समक्ष उपस्थिति दर्ज करानी पड़ी। कुल मिलाकर आज का दिन बहुत अच्छा गुजरा। गये थे तो मनन को, लेकिन वापसी लौटते वक्त हुआ काफी चिंतन। अरे यार चिंता वाला, न कि दिमागी। खैर अब जा रहा हूं सोने, इसका मतलब तुम्हें भी शुभ रात्रि।
- नितेश

10 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     'जब जागो तब सबेरा' - कब जागूंगा मैं? अभी तक यह प्रश्न एक यक्ष की भांति मेरे समक्ष खड़ा है। स्थिति है कि सुधर नहीं रही या मैं सुधारने की कोशिश नहीं कर रहा। वैसे आज हुए सवेरे में मैंने कल से ज्यादा ताजगी, ज्यादा हल्कापन महसूस किया। पूर्ववर्ती समय-सारिणी के अनुसार कार्य हुआ। दोपहर में दो-ढ़ाई घंटा पढ़ने का कार्यक्रम हुआ। शाम मस्ती में बीती- एक यूटोपियन गप्पों के साथ। क्रिकेट देखें। फिर एक मित्र की अंतरंग बातों से उसकी समझ का पता चला। रात्रि में भोजन। फिर तुम्हारे सामने भाषण। एक पुराने ढर्रे वाली बातें, नयी बातें नहीं, नया कुछ नहीं। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया- कब जागूंगा? और मैं जानता हूं जब जागूंगा तब ही सबेरा। यहां पर बीत रहा एक-एक दिन मेरे सामने आने वाली स्थिति पर हंसेगा और मुझे उनकी हंसी बंद करने के लिए या दबाने के लिए उनसे ज्यादा जोर से हंसना पड़ेगा। वैसे सुबह में एक मित्र से फोन पर बातचीत हुई उसके मुताबिक मुझे कल 'मनन' जाना होगा। यह ग्रेटर कैलाश में स्थित एक पुस्तकालय है। यहां से अगर हो सके तो जीवन को कोई रूप-रेखा मिलेगी। जीवन के दुरूह पथों पर नाना प्रकार के कष्टों का सामना करना जिसने सीख लिया, सिर्फ सीखा ही नहीं, उनसे सीख लेनी शुरू कर दिया, तो सब कुछ आसान लगेगा। अब तुम कहोगी- ' अच्छा बहुत हो गई लाइफ फिलोसॉफी, बंद करो ये बकवास'.... ओ के बाबा बंद करता हूं ऐसी बातें। बंद करता हूं अपनी लेखनी को। कल फिर मिलेंगे.. इसी समय.. इसी वक्त पर.. कहीं जाऊंगा नहीं... अलविदा.. शब्बा खैर...
- नितेश

9 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     प्रातःकाल में तीन बार बिछावन से आज उठे, लेकिन शारीरिक दर्द के कारण पुनः सो जाते थे। फिर भी किसी तरह उठकर शाखा जाना हुआ फिर दूध व सब्जी लेकर आए। पेट में अम्लता बढ़ी हुई लग रही थी, अतः मैंने पुदीन हरा लिया, उसके पश्चात कपड़ा धोने के बाद स्नान व पूजा-पाठ होने के बाद पेट-दर्द के कारण बिछावन पर लेटे रहे। घंटों लेटे रहे। इसी बीच टॉयलेट गये, जहां पेट दर्द के कारण का पता चला। शाम चार बजे तक आराम की ही मुद्रा में पड़े रहे, फिर पेपर-कटिंग एक मित्र के साथ किए। फिर बाजार से सामान लाना था, जो कि मित्रों के द्वारा ले आया गया। फिर आज मंगलवार था, हनुमान मंदिर गए। फिर रात में भोजन, विशेषकर जो बीमारी दूर करने के लिए बना था, करने के पश्चात ग्यारह बजे के करीब घर पर पापा से बात की फिर वापस लौटने के थोड़ी देर बाद मध्यरात्रि हो गई, फिर तुमसे संपर्क साधा। पूरा दिन एक डल दिन की तरह बीता। रह-रहकर एक गीत अपनी सच्चाई बता जाता, जिस गीत से हम पिछले महीने परिचित हुए- "सुख आते है, दुःख आते है, इन आते-जाते सुख-दुःख में हम मस्त रहते है, हम मस्त रहते है।" तो अभी स्थिति में मस्त रहने की कोशिश करते है, अब देखो कल ही पढ़ने के पश्चात जब मैं उठा तो बेंत की कुर्सी से एक कांटी निकली हुई थी जिससे कि मेरे दायें पैर में पीछे एक लंबा कट का निशान बन गया, उसका दर्द आज भी सता रहा है, माने स्थिति दुखत होते हुए भी मस्त है। दे रहा हूं कलम को विराम और आपको राम-राम।
- नितेश

8 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     दिन की शुरूआत उसी अंदाज में हुई। शाखा पर दो तरूण- अमितजी व कृष्णबल्लभजी से परिचय हुआ, बाद वाले मधुबनी, बिहार से थे। आज प्रातः दस बजे से पठन-पाठन के तहत अंग्रेजी के निर्धारित अभ्यासमालाओं का अभ्यास कर लिया गया। फिर एक मित्र के साथ राजीव गांधी चौक जाना पड़ा, उनका कार्य तो नहीं हुआ, लेकिन उनके कार्य के चक्कर में दस किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ गया। लौटे.. तो शाम को उसी अलसाये तरीके से बीताना पड़ा। संध्या सात बजे से आठ तक हुई पढ़ाई, फिर सब्जी खरीदाई फिर वही रात अलसायी। आजकल तुमसे जल्दी बात करने आ जाता हूं क्योंकि दस- साढ़े दस तक सोना पसंद करता हूं, अभी नींद जोर से आ रही है लेकिन भोजन का कार्यक्रम बाकी है। भोजन के पश्चात- शयनावकाश। तुम्हें देखने से लगा होगा- फिर वहीं फिजूल की बातें। निश्चय ही यह दिन भी खास उपलब्धियों वाला नहीं रहा। पढ़ाई, एम. ए. इतिहास विषय की, के दिशा में कोई कदम न उठाना मेरे लिए घातक सिद्ध हो रहा है। महाविद्यालय द्वारा परिचय-पत्र निर्गत न किए जाने से तरह-तरह की परेशानियां आ रही है। सर्वप्रथम तो बस-पास, फिर लाइब्रेरी कार्ड इत्यादि। हां, एक बात तुम्हें बता दूं- समसामयिक घटना है- कल रात विश्व के दरोगा द्वारा एक छुटभैये पर हमला हुआ। स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अब विश्व परिदृश्य में जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है या बुरा- यह तो वक्त ही बताएगा। एक मित्र ने आज अफने से संबंधित यक्ष प्रश्न रखा। स्थिति को समझ कर उत्तर देने की कोशिश कर रहा हूं और फ्लैट के पार्टनर्स के बीच भी एक तरह का शीतयुद्ध शुरू हो चुका है, उसका शमन जल्दी होगा। तुम्हें शुभ रात्रि।
- नितेश

7 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     'लक्ष्मी चंचला होती है'... ऐं तुम सोचोगी कि मैं ये क्या बात कर रहा हूं शायद पैसा घट गया है... नहीं ऐसी बात नहीं है इस संदर्भ में एक बात ध्यान आयी थी उसका उल्लेख नीचे कर रहा हूं। वैसे आज दिन की शुरूआत पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार गन्नौर यात्रा, गुरू मां का आश्रम जिस स्थान पर है, से शुरू हुई, वहां पर संकल्प लेने के उद्देश्य से गये थे। यात्रा सफल सिद्ध हुई। एक बात यहां बताना चाहूंगा- आश्रम का शांत, सुरम्य, मनमोहक वातावरण मन को प्रभावित करने में सफल रहा। वापसी साढ़े बारह बजे तक हुई। दोपहर के भोजन के पश्चात निकट के शिव मंदिर में एक मित्र के साथ प्रसाद लेने गये, तुरंत खाकर गये थे अतः तत्क्षण प्रसाद लेना मुश्किल लग रहा था लेकिन मित्र महोदय उत्साह दिखा रहे थे। उनके उत्साह को ठंडा किया, जिसका अर्थ उन्होंने घर वापस लौटते वक्त समझा। शाम एक शाम की तरह बीती। सात बजे से पठन-पाठन का कार्यक्रम चला। फिर जल्द ही तुम्हारे सामने हाजिर हुआ। इसके पश्चात भोजन व उसके पश्चात निद्रा। अब तक तो इसके बाद के लिए यही कार्यक्रम है। वैसे एक बात- आज फ्लैट में हमारे मित्र के एक भ्राताश्री आए थे। एकदम शांत स्वभाव वाले। लेकिन हमारे उस मित्र व एक और ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपना असली परिचय देने में कोई कसर न छोड़ी। यही स्थिति हमारे नीचे की भी है, तो तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में लक्ष्मी टिकेगी, कभी नहीं। वे दो मित्र भी श्रीयुक्त है लेकिन क्या श्रीयुक्त होना सब कुछ होता है, प्रेम नहीं तो वह अपनी चंचलता दिखाएगी ही। शेष शुभ...।
- नितेश

6 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                    इस रविवार को अर्थात 30.09 को एक अंग्रेजी पत्र के 'स्टार फॉरकॉस्ट' में दिए गए साप्ताहिक भविष्यवाणी के अनुसार अगर मैं काम करता तो निश्चय ही यह सप्ताह मेरे लिए उपलब्धियों वाला होता मगर ऐसा नहीं हो सका लेकिन कुछ ऐसे कार्य जरूर हुए है जो सही दिशा की ओर अग्रसर करने में सहायक होंगे। जीवन की लंबी कड़ी में जुड़ी आज की कड़ी अर्थात आज का दिन भी पूर्व दिनों की भांति शुरू हुआ लेकिन दस बजे से लेकर शाम पांच बजे तक एक शून्यता। आज से सायं सात बजे से दस बजे तक पढ़ने के निर्णय को बल मिला क्योंकि पठन-पाठन का कार्य हुआ और अच्छी तरीके से हुआ। एक फ्लैट पार्टनर द्वारा उठाई गई गणितीय गुत्थी सुलझ तो न सकी लेकिन समय खूब ले लिया। रात्रि ग्यारह बजे तक भोजन फिर यहां अध्ययन कक्ष में एक संवाद तुम्हारे साथ। आज एक उत्साहपूर्वक बात हुई। मैं और मेरे एक मित्र में संवाद और सौजन्यता अच्छी लगी। इस सप्ताह के शुरू के तीन दिवसों में सुबह की बेला में जो हमने अमृत वर्षा में स्नान किया था, उस वर्षा का आनंद लेने हम कल प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से पहले उस निर्माण-स्थली पर जाना है जहां पर ऐसी वर्षा करने वाले बादलों का निर्माण होता है। कुछ यात्राएं भी करना जरूरी है क्योंकि ज्ञान के लिए यात्रा करना आवश्यक है और दिल्ली के आसपास ऐसे इलाके है जहां पर आसानी से एक दिन का कार्यक्रम बनाकर घूम फिरकर आया-जाया जा सकता है। इन्हीं कुछ बातों के साथ देता हूं अपने कलम को विराम। अ.. अ.. अ... आपको शुभ रात्रि तो कहना भूल गया... अच्छा... शुभ रात्रि।
- नितेश

Tuesday, January 3, 2017

5 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     क्या करें, क्या न करें ये कैसी मुश्किल हाय- निश्चय ही इस गीत को गीतकार ने एक दुविधा वाली स्थिति में लिखा होगा, लेकिन आज हमलोगों के जीवन में अधिकांशतः लोग इसी समस्या से ग्रस्त है। एक योजना के तहत काम न करने वालों का क्या हश्र होता है- इसका परिणाम हम विभिन्न अवसरों पर देख सकते हैं। वैसे लगता है इस स्थिति के करीब पहुंच रहा हूं... नहीं... नहीं... नहीं यार ऐसा नहीं होने देना है। प्रातःकाल के कार्यक्रम यथानुरूप चले। आज कॉलेज गया जहां एक्जामिनेशन फॉर्म को जमा करा दिया, फिर आई-कार्ड व गन्नौर संबंधित जानकारी (बस अड्डे से) लेते हुए घर लौटे। पांच बजे भोजन व छह के बाद गोल गट्टा में लगा फट्टा तरातर मार प्रतियोगिता का दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण लगभग दो घंटे देखा। फिर नीचे आकर भोजन बनाने का उपक्रम हुआ। भोजन के पश्चात उपस्थित हुआ तुम्हारे समक्ष। अगर पूरे दिन का मूल्यांकन करे तो कोई मूल्य न निकला और इस दिन का अंकन  भी बाकी पिछले दिनों की तरह हो गया। आज नंदूजी रात्रि का भोजन बनाने आये। ये महोदय हमारे कुक है। यह जिस वक्त आये उस वक्त मैं एक काम में व्यस्त था तभी हमारे एक मित्र उनकी व्यथा सुनकर उनको अवकाश दे चुके थे, लेकिन मेरे हस्तक्षेप के पश्चात कुक महोदय रसोईघर में रोटी बनाने में जुट गये लेकिन हम अपने उस मित्र से तेजी में बात करने लगे, जिसका मुझे काफी दुख हुआ। मैं बात करने के क्रम में अनियंत्रित हो गया अर्थात् आवाज ऊंची हो गयी, थोड़ी देर बाद सब सामान्य हो गया। ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा। काफी रात हो चुकी है अतः.... शुभ रात्रि।
- नितेश

4 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज थोड़ा-सा सुधार सभी क्षेत्रों में मैंने महसूस किया, जो कि एक सराहनीय स्थिति है। साढ़े छह में प्रातः उठने के बाद शौच व मंजन का कार्य करके पौने सात तक शाखा पहुंचा व पूर्व के कार्यक्रम करते हुए साढ़े सात तक घर पहुंचा। आठ बजे 'समाचार प्रभात' सुनकर एक समाचार का खंडन हुआ। स्नान व नाश्ते के बाद साढ़े ग्यारह से दो बजे तक रूक-रूक कर पढ़ाई का कार्यक्रम चला फिर भोजन करने के पश्चात भी पढ़ाई चली। फिर चार बीस के लगभग एक मित्र के साथ केंद्रीय भंडार गया जहां से कुछ सामग्री लेकर आया रसोई घऱ के लिए। फिर द मेकिंग ऑफ हलवा कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ। फिर कुछ हंसी-मजाक के बाद आठ बजे से नौ बजे तक पढ़ने का कार्य हुआ। नौ से दस बजे तक शवासन की मुद्रा में था अर्थात् निद्रा ने जकड़ लिया। मित्रों द्वारा उठाने के पश्चात भोजन व तुमसे बात करने का मौका मिला, अब मैं दस मिनट बाद पुनः नींद के आगोश में चला जाऊंगा। आज तुम्हें जो पहली बात मैंने तुमसे कहीं उसका तात्पर्य यह है कि आज पढ़ाई के कार्यक्रम ने विस्तार पाया, दिन भर निद्रा जैसी स्थिति को टाला गया क्योंकि रात्रि में फिर सोने में समस्या आती है। स्थिति में अब भी सुधार की आवश्यकता है और मनुष्य हमेशा अच्छी स्थिति की ओर जाना चाहता है क्योंकि जिस स्थिति में वह है उससे भी अच्छे की संभावना निश्चय ही होती है। यूं ही इस दिशा में प्रयासरत रहना पड़ेगा कि एक अच्छी स्थिति को प्राप्त कर सकूं। ऐसी आशा, अभिलाषा व इच्छा की पूर्ति में तुम भी सहयोगी बनो। कुशल रात्रि।
- नितेश

3 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     पांच दिनों तक चली 'अमृत-वर्षा' के कारण सुबह के कार्यक्रमों में जो परिवर्तन आया था, वापस उसी ढर्रे पर लौट गया हूं। आज शाखा पहुंचा था  लेकिन उससे पहले ही विकिरः हो चुका था। दूध-सब्जी लाने के पश्चात स्नान-पूजा पाठ पूर्व की भांति हुए। नाश्ता के बाद पढ़ने की इच्छा नहीं हो रही थी, क्योंकि दो दिनों की हैरानी ने मुझे इस स्थिति के लिए नहीं छोड़ा। दिन सामान्य ही बीता। शाम के वक्त एक-डेढ़ घंटे वही सोने का प्रोग्राम हो गया। उठने के पश्चात मित्र द्वारा बनाये गये सूजी के हलवे को ग्रहण किया और बाजार से आटा व शिमला मिर्च लाये। फिर पढ़ने के लिए बैठे। थोड़ी देर पढ़ाई के पश्चात भोजन, फिर नीचे उतरकर कुल्फी खाने गये। फिर वापस लौटकर भी वहीं करना पड़ा जो दिन भर होता है या इस फ्लैट की जो मुख्य विशेषता है, लेकिन यह गलत है इससे अपने आपको बचाना होगा, ऐसी बातें इससे पहले भी उठी। सावधान किया गया। मुझमें ही दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी है, इसके विषय में कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। पिछले कुछ दिनों से मेरे द्वारा पढ़ाई संबंधी बातें या कुछ अन्य बातों के लिए सिर्फ कन्फेस किया जा रहा है, जो कि सरासर गलत है। इस बात को लेकर तो तुम्हारा विश्वास मुझ पर से उठ जाएगा। खैर.. आज सबसे बड़ी बात यह हुई कि किसी भी मद में मेरे द्वारा एक आना भी खर्च नहीं हुआ। यहां तक की शाम की कुल्फी भी खिलाई मैंने, लेकिन सौजन्यकर्ता हमारे कलकत्ता वाले मित्र थे। अच्छा..... मंगलमयी रात्रि।
- नितेश

2 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती है। राष्ट्र के प्रति किए गए उनके कार्यों की कोई निंदा नहीं कर सकता.. अगर करता है तो वह उन परिस्थितियों को नहीं जानता जिसमें सर्वकालीन पूज्यनीय इस महापुरूष का जन्म हुआ। वैसे आज मध्यरात्रि में करीब डेढ़-दो बजे सोने के पश्चात साढ़े छह में बिस्तर का त्याग करना पड़ा और 'अमृत-धारा' रुपी महायज्ञ के संपन्न होने वाले दिवस देर से पहुंचना एक कटु अनुभव रहा। फॉर्म जमा कराने के पश्चात वापस घर लौटना हुआ। जन्मदिवसीय बालक कुणाल के आने के कुछ देर पश्चात पार्टी हेतु कनॉट प्लेस जाना पड़ा लेकिन हल्के भोज्य पदार्थ व पेय लेने के पश्चात यह कार्यक्रम बना कि वापस घर लौटकर डोमिनो पिज्जा फूड सेंटर को आदेश देकर कुछ भोज्य सामग्री मंगवायी जाए। इसी बीच कुछ क्षण के लिए लेटने के पश्चात आधा घंटा गहरी निद्रा में रहा। जगने के बाद पेप्सी व द किलर गेम का कार्यक्रम चला। डोमिनो वालों ने होम डिलेवरी की, भोज्य पदार्थ खाए  फिर खेल थोड़ी देर और चला, फिर मैं केक लाने चला गया। हम अपने फ्लैट पार्टनर्स के साथ हनुमान मंदिर गए। इसी क्रम में पंचम द्वारा दिए गए कथन पर मेरे द्वारा जोर से बोल दिया जाना गलत हुआ क्योंकि यह मेरे ही नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। मेरे पीछे से दो पार्टनर्स द्वारा किए गए बातचीत ने इस बात को और बल दिया। खैर... सुधार की आवश्यकता मुझमें है- जे इस दिशा में प्रयासरत रहूंगा। मुख्य सुधार, पढ़ाई क्षेत्र से संबंधित, पर और बल दिये जाने की जरूरत है। कल से प्रातःकाल के कार्यक्रम में पूर्ण परिवर्तन आने की संभावना है। कार्यक्रम के साथ मुझमें भी। इसी आशा के साथ... शुभ रात्रि।
- नितेश

1 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     एक अक्टूबर यानि आज की शुरूआत रात के बारह बजे से ही सतीश को जन्मदिन की शुभकामना, पेपर-कटिंग के साथ और सुबह ब्रह्ममुहूर्त में जल्दी से शौच व स्नान के साथ हुई अर्थात् एक की रात्रि जागरण हुआ। सुबह आज कथा सागर में चौथे सोपान तक उतरे। यह तो अभी शुरूआत ही है क्योंकि अभी गहराई तक उतरना है। आज की यात्रा अनोखी रही। सुबह अगर पांच सेकेंड लेट होता तो बस छूट गयी होती उधर लौटते वक्त भी यही हुआ। खैर कुछ देर आराम किया या यूं कह लो कि आज निद्रा के शिकार ना ही हुए लेकिन अभी लिखने में इतनी समस्या आ रही है कि पूछो नहीं। संध्या में सतीशजी के जन्मदिवस की सामग्रियां लायी गयी। आठ बजे के पश्चात जन्मदिवस मनाया गया। ग्यारह बजे तक मस्ती फिर रात्रि टहल में आइसक्रीम खाकर आये। उसके पश्चात आकर वस्त्र धोने का प्रोग्राम और तुमसे बात करने का लेकिन रसोई में कुछ काम करने के पश्चात फॉर्म भरकर यहां अध्ययन कक्ष में बैठकर तुमसे बातें कर रहा हूं। बत्तीस घंटे तक जगने के पश्चात एक गहरी निद्रा मेरा इंतजार कर रही है, इसका प्रमाण तुम्हें आज तुम्हारें लिए गए अक्षरों से भी इसकी जानकारी मिल रही होगी। अतः दिन के कार्यव्यापार को देखकर यह कहा जा सकता है पढ़ाई फिर से शून्य, जो कि यहां अस्तित्व में रहने का सर्वप्रमुख कार्य है। अच्छा कल फिर एक अच्छी स्थिति के साथ मिलता हूं।
                                                           -नितेश

30 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     ' ओह गॉड ! इट्स संडे' - अंग्रेजी पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया के पूरक दिल्ली टाइम्स के नीचे लिखा यह वाक्य निश्चय ही बहुत मायने लिए हुए रखता है। आज रविवार है और विवि जाने के पश्चात दूसरा। यह यहां पर बहुत महत्व का दिन है क्योंकि सप्ताह भर की तेज जिंदगी के पश्चात लोगों को रिलैक्स करने का मौका मिलता है। खैर... प्रातःकाल की शुरूआत पिछले दो दिनों की तरह हुई। ज्ञान की प्यास और परमात्मा की तड़प बढ़ती ही जा रही है- लेकिन यह इतना आसान नहीं है। वापसी के पश्चात फ्लैट-पार्टनर्स को थोड़ी नसीहत दी गयी। दोपहर के भोजन से पहले पहली बार यहां जल-संकट का सामना करना पड़ा। भोजनोपरांत फिर एक बार अच्छी नींद ली गयी। इधर एक-दो दिन से यह महसूस हो रहा है कि सुबह शाखा में जो थोड़े व्यायाम, योग आदि करते उससे दिन का कार्य-व्यापार करने में कोई कठिनाई नहीं आती, अतः बुधवार से पुनः यह स्थिति संभव होने के पश्चात ऐसी स्थिति (नींद) नहीं आएगी। संध्या सामान्य तरीके से बीती। रात्रि में ज्योंहि पत्र से कतरन निकालने के लिए बैठा कि हमारे रसोईये महोदय ने आकर कल की भोजन-सूची बनाने में मदद की। उसके पश्चात एक मित्र के साथ रसोई से रसोई का सामान व दूसरे मित्र के साथ सब्जबाग से सब्जी लाने का कार्य हुआ। उसके पश्चात रात्रि का भोजन। फिर आपके सामने उपस्थित हुआ। कल रात्रि में 'राजकुमार' द्वारा अपने जन्मोत्सव की खुशी में पहले ही कुछ ठंडक पदार्थों का सेवन किया गया। अब मैं यहां से सीधे सोने के लिए जा रहा हूं। कुछ क्षण पश्चात मैं होऊंगा रात्रि के गोद में। मंगलमयी रात्रि आपको भी।
                                                                                                                             - नितेश

29 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     प्रातःकाल के क्रम को आज भी जारी रखा गया। कथा स्थल पर पहुंचने में थोड़ी दिक्कतें हुई, लेकिन अमृत-वर्षा में आज भीगने का कुछ ज्यादा ही आनंद मिला। घर लौटने से पूर्व एक मित्र के साथ एक मंदिर जाना हुआ व लौटने पर आवास में रह रहे अन्य साथियों ने अपनी अज्ञानता के चपेट में मेहमानों को भी ले लिया- ये एक कटु अनुभव सिद्ध हुआ क्योंकि एकता की जरूरत हर संगठन में होती है। नाश्ता व कुछ बातचीत के पश्चात सिर दर्द के कारण थोड़ा लेटने के विचार से बिछावन पर गया लेकिन नींद ने मुझे अपनी चपेट में ले लिया और दीर्घकालीन निद्रावस्था में पड़े रहने के पश्चात जब उठा तब भी हल्का दर्द बना हुआ था। निश्चय ही यह पिछले दो दिनों शरीर द्वारा किए गए अथक परिश्रम का नतीजा था। परिश्रम की दिशा ठीक कार्यों की ओर उन्मुख थी भी और नहीं भी। शाम में आधा घंटा छत पर बीताने के बाद नीचे आया। नीचे से और नीचे सब्जी लाने के लिए जाना पड़ा। फिर इतने दिनों के बाद साढ़े आठ से साढ़े दस तक पठन-पाठन व भोजन का कार्यक्रम चला। चार दिवस की अकर्मण्यता के पश्चात आज कुछ पढ़ाई का कार्य हुआ। अभी कल प्रातः फिर उठना है और पुनः इससे भी अच्छा दिन बीते- भगवान से यह मंगलकामना करता हूं। अभी मित्रों द्वारा रात्रिकाल के टहलने पर निकलने जाना है- खूब दबाब डाला जा रहा है अतः यही विराम देता हूं। कल फिर मिलेंगे- इस वादे के साथ शुभ रात्रि।
       - नितेश

28 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                      जिंदगी के चंद लम्हों का बेसब्री से जो इंतजार रहता है, उसको पाने के बाद जो खुशी मिलती है- दोनों में एक अन्योन्याश्रय संबंध है। आज प्रातः छह बजे तक नाश्ता करने के पश्चात आनंदमयीमूर्ति मां के प्रवचन हेतु मैं व मेरा मित्र सत्यप्रकाश ज्योंहि प्रस्थान किए कि पिछले महीने की गई गलती को फिर दोहरा दिया गया लेकिन इस बार भी होशियारी दिखानी पड़ी खैर... सात बजे तक प्रवचन स्थल पर पहुंचे। सात पच्चीस से नौ पांच तक जो अमृत धारा बही उसमें स्नान कर मन प्रसन्न हुआ। उसके तत्पश्चात विश्वविद्यालय प्रांगण पहुंचा लेकिन कुछ लम्हों की महत्ता ने यहां के लम्हे से महरूम कर दिया फिर उसके बाद वाला कालांश भी किन्हीं कारणों से नहीं हो सका। साढ़े ग्यारह में प्रेमजी से मुलाकात के पश्चात हम दोनों द्वारा विवेकजी का इंतजार करना भी निष्फल रहा। घर पर एक बजे लौटने के पश्चात दोपहर का भोजन लेने के क्रम में नीरज व प्रिंस का आगमन एक मधुर झोंके के समान लगा। फिर दिन-शाम व रात बात करने में ही बीता। मानवीय कमजोरी यहां भी कायम रही। मुख्य कार्य की दिशा में कोई उचित कदम नहीं उठा सका। आज रात्रि में कई दिनों पश्चात नीचे टहलने के लिए मित्रों के साथ उतरे। फिर वापस लौटने के पश्चात तुम्हारी याद आयी तो मैं यहां चला आया यानि कि अध्ययन कक्ष में। रात बहुत हो चुकी। दस बजे सोना था लेकिन अभी मध्यरात्रि होने जा रही है। आज सवेरे जो श्रृंखला शुरू हुई उसे कल भी जारी रखना है। लेकिन मुख्य कार्य की कठिनता उन सभी चीजों से समझौता करने को कहती है। करना ही पड़ेगा। शेष शुभ।
                                                        - नितेश

27 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज अचानक सवा चार में उठना हो गया। शौच व मंजन के पश्चात अलसायी हुई शारीरिक स्थिति के कारण आधा घंटा और लेटना पड़ा। पौने छह तक शाखा रवानगी हुई। आज योग के कुछ चरणों को सीखे। पुनः वही कार्यक्रम करते हुए पौने नौ में विश्वविद्यालय गये, पहले दो कलांश वाले आचार्य की अनुपस्थिति के कारण महेश से मिलने गये फिर साढ़े ग्यारह बजे वाला कालांश करने के पश्चात डेढ़ बजे तक लौटे। जल्दी से खाकर दो-दस तक पुनः विश्वविद्यालय जाना पड़ा क्योंकि स्नातकोत्तर पूर्वार्ध वालों के लिए उत्तरार्ध वालोंं ने एक पार्टी का आयोजन किया। पूर्वार्ध के छात्रों की संख्या पंद्रह के करीब थी और उनकी साठ के करीब। परिचय, सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात छह बजे तक घर वापस लौटना पड़ा। फिर नेहरू विहार में दो मित्रों से मिलने के लिए गये लेकिन दोनों से भेंट नहीं हुई। वापसी सात बजे हुई। सात से नौ का समय शारीरिक थकावट के कारण बिछावन पर लेटे लेटे बीता। हां... एक बात और यहां कलकता वाले मित्र सतीश का वापस लौटना हुआ। नौ बजे तुमसे सारी व्यथा कहने के लिए बैठा हूं। अब इसके पश्चात भोजने करने के बाद नींद के आगोश में चला जाउंगा क्योंकि कल सुबह एक अत्यावश्यक कार्यक्रम के कारण निकलना पड़ सकता है। क्षमा करना... पठन-पाठन से संबंधित गतिविधियां आज दूसरे दिन भी ठप्प रही। अब जल्द ही एक वास्तविक कदम उस दिशा में उठाना होगा। शेष शुभ।
                        - नितेश

26 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     एक लंबे अर्से के बाद ऐसा लगा कि मैं तुम्हें अपने दिल का हाल-चाल सुनाऊं क्योंकि दिल्ली प्रवास के दौरान ऐसा लगा कि कुछ मिस हो रहा है। यहां चार जुलाई को आगमन के पश्चात इच्छा हुई थी कि दिन-प्रतिदिन मैं तुम्हें अपनी व्यथा सुनाऊं, लेकिन आज मैं इसे मूर्त रूप दे रहा हूं। अच्छा चलो.. अब बात करते है आज दिन कैसा बीता। वही सुबह साढ़े पांच में उठना जो कि पिछले कुछ दिनों से मेरी आदत में शुमार हो गया है। उठने के पश्चात शौच व मंजन के पश्चात शाखा जाने का कार्यक्रम हुआ.. यह भी लगातार पिछले एक माह से हो रहा है लेकिन आज मैं अकेले नहीं बल्कि मेरे रूम-पार्टनर्स सत्य प्रकाश, विजयेंद्र, विकास और पंचम भी गये। वहां खूब मजा आया। फिर नित्य क्रिया कर्म के अनुसार दूध व सब्जी लाने के पश्चात वापस लौटने पर कपड़े धोने, स्नान व पूजा-पाठ का कार्यक्रम नौ बजे तक चला। फिर नाश्ता लेकर, कॉलेज को गया, वहां पर दो मूल प्रमाण-पत्र जमा कराने के पश्चात कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित भारतीय विद्या भवन में कंप्यूटर कोर्स की फीस जमा कराकर तीन बजे तक घर पर लौटा। आराम के साथ-साथ सितंबर माह के खर्चों पर विहंगम दृष्टिपात किया गया। फिर साढ़े सात बजे निकट के रामलीला मैदान में श्रीकृष्ण रासलीला का आनंद लेने गया। दस बजे वापस घर लौटकर खाना खाने के पश्चात तुमसे बात करने की इच्छा हुई, सो मैंने की। अच्छा अब काफी रात हो गयी है। मुझे सोने जाना है... तो शुभ रात्रि। फिर कल मिलते है।
                                                                        - नितेश