Tuesday, January 3, 2017

1 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     एक अक्टूबर यानि आज की शुरूआत रात के बारह बजे से ही सतीश को जन्मदिन की शुभकामना, पेपर-कटिंग के साथ और सुबह ब्रह्ममुहूर्त में जल्दी से शौच व स्नान के साथ हुई अर्थात् एक की रात्रि जागरण हुआ। सुबह आज कथा सागर में चौथे सोपान तक उतरे। यह तो अभी शुरूआत ही है क्योंकि अभी गहराई तक उतरना है। आज की यात्रा अनोखी रही। सुबह अगर पांच सेकेंड लेट होता तो बस छूट गयी होती उधर लौटते वक्त भी यही हुआ। खैर कुछ देर आराम किया या यूं कह लो कि आज निद्रा के शिकार ना ही हुए लेकिन अभी लिखने में इतनी समस्या आ रही है कि पूछो नहीं। संध्या में सतीशजी के जन्मदिवस की सामग्रियां लायी गयी। आठ बजे के पश्चात जन्मदिवस मनाया गया। ग्यारह बजे तक मस्ती फिर रात्रि टहल में आइसक्रीम खाकर आये। उसके पश्चात आकर वस्त्र धोने का प्रोग्राम और तुमसे बात करने का लेकिन रसोई में कुछ काम करने के पश्चात फॉर्म भरकर यहां अध्ययन कक्ष में बैठकर तुमसे बातें कर रहा हूं। बत्तीस घंटे तक जगने के पश्चात एक गहरी निद्रा मेरा इंतजार कर रही है, इसका प्रमाण तुम्हें आज तुम्हारें लिए गए अक्षरों से भी इसकी जानकारी मिल रही होगी। अतः दिन के कार्यव्यापार को देखकर यह कहा जा सकता है पढ़ाई फिर से शून्य, जो कि यहां अस्तित्व में रहने का सर्वप्रमुख कार्य है। अच्छा कल फिर एक अच्छी स्थिति के साथ मिलता हूं।
                                                           -नितेश

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