Wednesday, January 4, 2017

10 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     'जब जागो तब सबेरा' - कब जागूंगा मैं? अभी तक यह प्रश्न एक यक्ष की भांति मेरे समक्ष खड़ा है। स्थिति है कि सुधर नहीं रही या मैं सुधारने की कोशिश नहीं कर रहा। वैसे आज हुए सवेरे में मैंने कल से ज्यादा ताजगी, ज्यादा हल्कापन महसूस किया। पूर्ववर्ती समय-सारिणी के अनुसार कार्य हुआ। दोपहर में दो-ढ़ाई घंटा पढ़ने का कार्यक्रम हुआ। शाम मस्ती में बीती- एक यूटोपियन गप्पों के साथ। क्रिकेट देखें। फिर एक मित्र की अंतरंग बातों से उसकी समझ का पता चला। रात्रि में भोजन। फिर तुम्हारे सामने भाषण। एक पुराने ढर्रे वाली बातें, नयी बातें नहीं, नया कुछ नहीं। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया- कब जागूंगा? और मैं जानता हूं जब जागूंगा तब ही सबेरा। यहां पर बीत रहा एक-एक दिन मेरे सामने आने वाली स्थिति पर हंसेगा और मुझे उनकी हंसी बंद करने के लिए या दबाने के लिए उनसे ज्यादा जोर से हंसना पड़ेगा। वैसे सुबह में एक मित्र से फोन पर बातचीत हुई उसके मुताबिक मुझे कल 'मनन' जाना होगा। यह ग्रेटर कैलाश में स्थित एक पुस्तकालय है। यहां से अगर हो सके तो जीवन को कोई रूप-रेखा मिलेगी। जीवन के दुरूह पथों पर नाना प्रकार के कष्टों का सामना करना जिसने सीख लिया, सिर्फ सीखा ही नहीं, उनसे सीख लेनी शुरू कर दिया, तो सब कुछ आसान लगेगा। अब तुम कहोगी- ' अच्छा बहुत हो गई लाइफ फिलोसॉफी, बंद करो ये बकवास'.... ओ के बाबा बंद करता हूं ऐसी बातें। बंद करता हूं अपनी लेखनी को। कल फिर मिलेंगे.. इसी समय.. इसी वक्त पर.. कहीं जाऊंगा नहीं... अलविदा.. शब्बा खैर...
- नितेश

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