Wednesday, January 4, 2017

11 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     कल जो मैंने प्रश्न उठाया था पहली पंक्ति में, उसका उत्तर स्वयं ढूंढ़ने की कोशिश की, कुछ हद तक सफलता मिली। सुबह उठने के पश्चात जब मैं शौचालय से लौटा तो एक मित्र द्वारा चिकित्सक के विषय में पूछा गया कि कोई से जान-पहचान है क्या? मैंने अग्रवाल साहब की बात की और शाखा चला गया। वहां शाखा पर जब मैं था तो दूसरे मित्र की सहायता से वह मित्र वहां आया, मौके की नजाकत को देखते हुए उसे वहीं डॉ. सिंह के यहां दिखलाया गया। शाखा के अन्य स्वयंसेवकों द्वारा वहां आकर यह जाना कि हमारे लिए कोई सेवा- निश्चय ही एक बड़े सांगठनिक बल की ओर इशारा करता है। उसके बाद वही दिनचर्या। दस बजे मनन जानने के क्रम में बस में मो. एस. अनवर द्वारा रखी गयी बातें मन को झकझोर गयी। फिर देर-सबेर यानी एक बजे तक मनन पहुंचा। भोजनोपरांत शुरू हुआ अजस्रधारा का प्रवाह। वहां पर मैंने पाया कि एक ऐसे बौद्धिक क्षमता का विकास उन लोगों के द्वारा कर लिया गया है कि वे एक नामी इतिहासकार को चुनौती देने में नहीं हिचकते। तत्पश्चात एक मित्र द्वारा मेरे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की जानकारी ली गयी, फिर उनके द्वारा हुआ दिशा-निर्देशन। मनन में एक पाठ पढ़ने के लिए मन को लगाना पड़ा। पुनः वापस लौटने के क्रम में सदर से एक समतापी बर्तन की खरीददारी में लगभग दो घंटे क्षय हुआ। घर लौटने पर भोजन, तत्पश्चात शीतल पेय। फिर तुम्हारे समक्ष उपस्थिति दर्ज करानी पड़ी। कुल मिलाकर आज का दिन बहुत अच्छा गुजरा। गये थे तो मनन को, लेकिन वापसी लौटते वक्त हुआ काफी चिंतन। अरे यार चिंता वाला, न कि दिमागी। खैर अब जा रहा हूं सोने, इसका मतलब तुम्हें भी शुभ रात्रि।
- नितेश

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