Wednesday, January 4, 2017

12 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     कल मेरे द्वारा की गयी लंबी बस यात्रा का प्रभाव आज सुबह देखने को मिला। उठने का मन नहीं हो रहा था फिर भी शाखा जाना हुआ फिर वहां से संपर्क हेतु जाना पड़ा। स्नान में देरी कुक के इंतजार के कारण हुई फिर पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम को टालते-टालते आखिरकार टालना ही पड़ा। दोपहर में भोजन-निर्माण के पश्चात, ग्रहण करने के बाद धौलाकुंआ मित्र के यहां पहुंचे फिर शिव मूर्ति के निकट पहुंचे, जहां विश्व के सर्वाधिक तेज की बोर्ड प्लेयर अदनान सामी और शंकर महादेवन का कंसर्ट था। अंतिम क्षणों में कंसर्ट का आनंद लिया गया। साढ़े दस तक कंसर्टोपरांत हम एन एच-8 पर थे और साढ़े बारह तक घर पर। मिलाजुला कर दिन ठीक बीता। पठन-पाठन संबंधित कुछ कार्य न हो सका, ऐसा स्वाभाविक था क्योंकि मेरे लिए भोर का तारा ही पूरे दिन को बतला डालता है। मुझे बचपन में पढ़ी एक कविता याद आ रही है, भले ही उस समय हमलोग जोश में उस कविता का पाठ कर लिया करते थे, लेकिन उसमें निहित दर्शन को हम लोग आज समझ रहे हैं। कविता है- ' ये जीवन क्या है? निर्झर है, बहना ही इसका पानी है, सुख-दुख के तीरों से टकराता चल रहा मनमानी है।' कविता मैंने यहां शब्दशः नहीं रखा है, फिर भी इसी प्रकार कविता थी। तो मेरे कहने का अभिप्राय है- हमें निर्झर की तरह होना चाहिए, सदा गतिमान। क्योंकि जैसे ही जीवन की  गति में थोड़ी सी कमी आती है या रुकने जैसे हो जाता है, बड़ा बोरिंग लगता है। अच्छा ओ के चलता हूं, कल फिर मिलेंगे... शब्बा खैर।
- नितेश

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