Thursday, January 5, 2017

13 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज जब मैं सुबह उठा तो सूरज सिर पर चढ़ आया था। यह कल रात की थकान, जो कि कंसर्ट के कारण हुई, का नतीजा था। सुबह उठकर शौच कर्म व स्नान कर श्रीसद्गुरूधाम मंदिर जाना हुआ, वहां पर एक सूचना लिखनी थी, जिसे लिखकर मैं साढ़े दस के करीब घर पर लौटा और फिर नाश्ता कर सोने को चला गया। थकान गजब की थी। फिर ढ़ाई बजे उठने के पश्चात भोजन किए, फिर शुरू हुआ चिकित्सा केंद्रों में जाने का सिलसिला। पहले एक मित्र को लेकर डॉ. सिंह के यहां गये वहां पर संपर्कोंपरांत देवीज डायग्नॉस्टिक सेंटर गए वहां उसी मित्र का अल्ट्रासाउंड कराना था। समय साढ़े पांच का मिला। लौटने के पश्चात वस्त्रों में आयरन कराने गए फिर एक दूसरे मित्र को लेकर डॉ. मोंगा के पास गये वहां से लौटने के तुरंत बाद पूर्व उल्लिखित केंद्र पर जाना पड़ा। चिकित्सक साहब की देरी की वजह से वहां कार्य साढ़े सात तक संपन्न हुआ। वापस होने पर एक घंटे पढ़ाई का काम चला, फिर  भोजन, फिर उठानी पड़ी लेखनी, तुम्हें, आज क्या हुआ- यह बताने के लिए। फिर एक कार्य करने के पश्चात होगा सोने का उपक्रम। फिर होगी- एक मीठी रात, फिर उत्साहित, उल्लिसित सबेरा। ज्यों-ज्यों छुट्टियां बीतती जा रही है- एक अनजाना, अनदेखा भय समा रहा है। इससे भयभीत एकदम नहीं हूं बल्कि यह कर्तव्यबोध करानेवाला है। एक सुनिश्चित भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो- यही मेरी भगवान से प्रार्थना है। अच्छा बहुत हो गयी बातें। शुभ रात....।
- नितेश

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