Thursday, January 5, 2017

14 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज रविवार है.... यानि की था। मेरे लिए तो वैसे रविवार पूर्णतया छुट्टी का दिन होता है, लेकिन इस बार ऐसा महसूस हुआ नहीं क्योंकि विश्वविद्यालय में ऑटम वैकेशन चल रहा है और पूरा पखवाड़ा यूं ही बीता। खैर... अब अगले संडे को ऐसा महसूस होगा तब मजा आएगा। वैसे आज भी सुबह के कार्यक्रम पूर्व की भांति चले लेकिन सफाई कार्यक्रम जोरों पर चला। सभी काम करने के पश्चात आज केंद्रीय भंडार सामान लाने गए। फिर लौटने के पश्चात वहीं शून्यता। कोई कंस्ट्रक्टिव वर्क नहीं। शाम में मोबाइल से पिताश्री से बात हुई। सूचना मिली कि राजू चाचा कल आ रहे है, तो उनसे कुछ सामान व मुद्रा लेने कल स्टेशन जाना होगा अतः सुबह के दो लगातार कार्यक्रम हो गए जिस कारण प्रातः जल्दी उठना होगा। फिर रात्रि भोजन के पश्चात... यहां अध्ययन कक्ष में। कल तो कुछ व्यस्तताएं भी थी, लेकिन आज एकदम खाली-खाली सा दिन बीता। फिर कल व्यस्त कार्यक्रम रहेगा। और.. परसों से तो विश्वविद्यालय पुनः खुल रहा है। मैंने इन छुट्टियों को कोई सदुपयोग नहीं किया। तुम पूछोगी... ऐसा क्यों? अरे भाई... ऐसा अपना बैकग्राउंड ही है। कभी सिंसियर नहीं रहे। लेकिन अब नहीं तो कभी नहीं। अतः जल्द ही इस दिशा में एक सार्थक एवं उचित कदम उठाना पड़ेगा। कुछ करें या ना करें... ऐसा सोचना अब बेकार होगा। एक ऑडेसियस स्टेप उठाना होगा चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये। ओके चलता हूं.. बत्रा.... फिर आकर सोऊंगा।
- नितेश

No comments:

Post a Comment