Thursday, January 5, 2017

16 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     आज की दिनचर्या पूर्व की भांति ना होकर थोड़ी व्यस्त थी। सुबह उठने के साथ ही शाखा, फिर लौटनेत वक्त दूध-दही व सब्जी फिर नौ बजे तक पूरी तरह से तैयार। साढ़े नौ तक विश्वविद्यालय पहुंचना था लेकिन बस के कारण दस मिनट की देरी हुई फिर भी दो क्लासेज लगातार हुई। पहली पूरी सौ मिनट अरूप बनर्जी सर ने ली फिर दूसरी क्लास पचास मिनट की शर्मा सर ने ली, फिर वहां से महाविद्यालय परिचय-पत्र हेतु गये, लेकिन पहुंचते-पहुंचते वहां लंच टाइम हो गया अतः इंतजार करने के पश्चात उससे संबंधित अधिकारी से मिले, उन्होंने अगले सप्ताह का समय दिया। वहां से घर वापस आये पांच बजे। भोजनोपरांत थोड़ी देर बाहर  बरामदा में  बैठे। फिर एक मित्र को लेकर औषधालय गए। वहां से मंदिर से भी होकर आ गए। आने के पश्चात कुछ देर तक पत्रों के पन्नों को पलटे। फिर किताब हेतु बाहर निकले लेकिन वापस एक बार आने के बाद फिर वहीं पुस्तक दूसरे जरिए से मिली। घर लौटने पर भोजन फिर हाल-चाल लेखन। पूरा दिन एक तरह से व्यस्तता से घिरा रहा। अभी कुछ दिनों तक वह गति नहीं आ सकती, जिस गति की आवश्यकता है, लेकिन उस दिशा में कार्य करना जरूरी है। महती कार्यों के बीच अपना संतुलन बनाये रखना- वह भी मानसिक संतुलन एकदम जरूरी होता है। जिससे कि आने वाली बाधाओं से भी आसानी से निपटा जा सकता है। इसलिए एक-एक दिन इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपने संतुलन बनाए रखकर कितना एचीव किया। अच्छा देता हूं कलम को विश्राम... आपको राम-राम।
- नितेश

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