Thursday, January 5, 2017

18 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                    'एकला चलो रे'- यह बांग्ला गीत जब गांधीजी ने आजादी से पहले हुए दंगों के दौरान दंगा प्रभावित क्षेत्रों के सड़कों पर गाते हुए आगे बढ़ रहे थे तो उस समय उनकी जो मानसिकता थी- उसी से लगभग मुझे गुजरना पड़ रहा है। वहां परिस्थितियां भयावह और एक बड़े स्तर पर थी पर यहां ऐसी बात नहीं है और न हीं समस्याएं उतनी बड़ी है। सिर्फ एक ही नहीं दो-तीन संदर्भों में हम ऐसी बातें कर सकते है, लेकिन स्थिति क्या होगी? वहीं ढ़ा के तीन पात। अब शुरू करते है आज की बात। दिन की हुई वैसी ही शुरूआत। लेकिन कल से गति में कमी थी। ग्यारह बजे विश्वविद्यालय जाना कारण था। साढ़े ग्यारह से शुक्ला सर की एक घंटी हुई। वहां से एक मित्र के साथ हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय जाकर किताबें खरीदने का कार्य हुआ। वापस लौटने पर भोजन। फिर लंबा रेस्ट। चार बजे से थोड़ी चेकिंग, कपड़े पर लोहा। वीरवार बाजार से कुछ सामानों की खरीददारी के बाद वापसी। फिर फ्लैटजन्य समस्या के कारण दस बजे तक कुछ क्रिएटिव कार्य न हो सका। भोजनोपरांत पानी लाना फिर जाकर कुछ पठन-पाठन। फिर मध्य रात्रि के करीब मैं हुआ तुम्हारे करीब। ऊपर की शुरूआत कुछ भारी-भरकम नहीं लग रही है.. अरे यार ऐसी कोई बात नहीं है। कुछ समस्याएं तो जरूर आयी है, लेकिन जिनके कारण आयी है- यह भी स्पष्ट है। अरे भाई... मेरे कारण ही आयी है और मुझे ही हल ढूंढना है। हल सही-सही ढूंढ सकूं... इस वादे के साथ शब्बा खैर...
- नितेश

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