Tuesday, January 3, 2017

26 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     एक लंबे अर्से के बाद ऐसा लगा कि मैं तुम्हें अपने दिल का हाल-चाल सुनाऊं क्योंकि दिल्ली प्रवास के दौरान ऐसा लगा कि कुछ मिस हो रहा है। यहां चार जुलाई को आगमन के पश्चात इच्छा हुई थी कि दिन-प्रतिदिन मैं तुम्हें अपनी व्यथा सुनाऊं, लेकिन आज मैं इसे मूर्त रूप दे रहा हूं। अच्छा चलो.. अब बात करते है आज दिन कैसा बीता। वही सुबह साढ़े पांच में उठना जो कि पिछले कुछ दिनों से मेरी आदत में शुमार हो गया है। उठने के पश्चात शौच व मंजन के पश्चात शाखा जाने का कार्यक्रम हुआ.. यह भी लगातार पिछले एक माह से हो रहा है लेकिन आज मैं अकेले नहीं बल्कि मेरे रूम-पार्टनर्स सत्य प्रकाश, विजयेंद्र, विकास और पंचम भी गये। वहां खूब मजा आया। फिर नित्य क्रिया कर्म के अनुसार दूध व सब्जी लाने के पश्चात वापस लौटने पर कपड़े धोने, स्नान व पूजा-पाठ का कार्यक्रम नौ बजे तक चला। फिर नाश्ता लेकर, कॉलेज को गया, वहां पर दो मूल प्रमाण-पत्र जमा कराने के पश्चात कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित भारतीय विद्या भवन में कंप्यूटर कोर्स की फीस जमा कराकर तीन बजे तक घर पर लौटा। आराम के साथ-साथ सितंबर माह के खर्चों पर विहंगम दृष्टिपात किया गया। फिर साढ़े सात बजे निकट के रामलीला मैदान में श्रीकृष्ण रासलीला का आनंद लेने गया। दस बजे वापस घर लौटकर खाना खाने के पश्चात तुमसे बात करने की इच्छा हुई, सो मैंने की। अच्छा अब काफी रात हो गयी है। मुझे सोने जाना है... तो शुभ रात्रि। फिर कल मिलते है।
                                                                        - नितेश

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