Tuesday, January 3, 2017

28 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                      जिंदगी के चंद लम्हों का बेसब्री से जो इंतजार रहता है, उसको पाने के बाद जो खुशी मिलती है- दोनों में एक अन्योन्याश्रय संबंध है। आज प्रातः छह बजे तक नाश्ता करने के पश्चात आनंदमयीमूर्ति मां के प्रवचन हेतु मैं व मेरा मित्र सत्यप्रकाश ज्योंहि प्रस्थान किए कि पिछले महीने की गई गलती को फिर दोहरा दिया गया लेकिन इस बार भी होशियारी दिखानी पड़ी खैर... सात बजे तक प्रवचन स्थल पर पहुंचे। सात पच्चीस से नौ पांच तक जो अमृत धारा बही उसमें स्नान कर मन प्रसन्न हुआ। उसके तत्पश्चात विश्वविद्यालय प्रांगण पहुंचा लेकिन कुछ लम्हों की महत्ता ने यहां के लम्हे से महरूम कर दिया फिर उसके बाद वाला कालांश भी किन्हीं कारणों से नहीं हो सका। साढ़े ग्यारह में प्रेमजी से मुलाकात के पश्चात हम दोनों द्वारा विवेकजी का इंतजार करना भी निष्फल रहा। घर पर एक बजे लौटने के पश्चात दोपहर का भोजन लेने के क्रम में नीरज व प्रिंस का आगमन एक मधुर झोंके के समान लगा। फिर दिन-शाम व रात बात करने में ही बीता। मानवीय कमजोरी यहां भी कायम रही। मुख्य कार्य की दिशा में कोई उचित कदम नहीं उठा सका। आज रात्रि में कई दिनों पश्चात नीचे टहलने के लिए मित्रों के साथ उतरे। फिर वापस लौटने के पश्चात तुम्हारी याद आयी तो मैं यहां चला आया यानि कि अध्ययन कक्ष में। रात बहुत हो चुकी। दस बजे सोना था लेकिन अभी मध्यरात्रि होने जा रही है। आज सवेरे जो श्रृंखला शुरू हुई उसे कल भी जारी रखना है। लेकिन मुख्य कार्य की कठिनता उन सभी चीजों से समझौता करने को कहती है। करना ही पड़ेगा। शेष शुभ।
                                                        - नितेश

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