Tuesday, January 3, 2017

29 सितंबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     प्रातःकाल के क्रम को आज भी जारी रखा गया। कथा स्थल पर पहुंचने में थोड़ी दिक्कतें हुई, लेकिन अमृत-वर्षा में आज भीगने का कुछ ज्यादा ही आनंद मिला। घर लौटने से पूर्व एक मित्र के साथ एक मंदिर जाना हुआ व लौटने पर आवास में रह रहे अन्य साथियों ने अपनी अज्ञानता के चपेट में मेहमानों को भी ले लिया- ये एक कटु अनुभव सिद्ध हुआ क्योंकि एकता की जरूरत हर संगठन में होती है। नाश्ता व कुछ बातचीत के पश्चात सिर दर्द के कारण थोड़ा लेटने के विचार से बिछावन पर गया लेकिन नींद ने मुझे अपनी चपेट में ले लिया और दीर्घकालीन निद्रावस्था में पड़े रहने के पश्चात जब उठा तब भी हल्का दर्द बना हुआ था। निश्चय ही यह पिछले दो दिनों शरीर द्वारा किए गए अथक परिश्रम का नतीजा था। परिश्रम की दिशा ठीक कार्यों की ओर उन्मुख थी भी और नहीं भी। शाम में आधा घंटा छत पर बीताने के बाद नीचे आया। नीचे से और नीचे सब्जी लाने के लिए जाना पड़ा। फिर इतने दिनों के बाद साढ़े आठ से साढ़े दस तक पठन-पाठन व भोजन का कार्यक्रम चला। चार दिवस की अकर्मण्यता के पश्चात आज कुछ पढ़ाई का कार्य हुआ। अभी कल प्रातः फिर उठना है और पुनः इससे भी अच्छा दिन बीते- भगवान से यह मंगलकामना करता हूं। अभी मित्रों द्वारा रात्रिकाल के टहलने पर निकलने जाना है- खूब दबाब डाला जा रहा है अतः यही विराम देता हूं। कल फिर मिलेंगे- इस वादे के साथ शुभ रात्रि।
       - नितेश

No comments:

Post a Comment