Tuesday, January 3, 2017

3 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     पांच दिनों तक चली 'अमृत-वर्षा' के कारण सुबह के कार्यक्रमों में जो परिवर्तन आया था, वापस उसी ढर्रे पर लौट गया हूं। आज शाखा पहुंचा था  लेकिन उससे पहले ही विकिरः हो चुका था। दूध-सब्जी लाने के पश्चात स्नान-पूजा पाठ पूर्व की भांति हुए। नाश्ता के बाद पढ़ने की इच्छा नहीं हो रही थी, क्योंकि दो दिनों की हैरानी ने मुझे इस स्थिति के लिए नहीं छोड़ा। दिन सामान्य ही बीता। शाम के वक्त एक-डेढ़ घंटे वही सोने का प्रोग्राम हो गया। उठने के पश्चात मित्र द्वारा बनाये गये सूजी के हलवे को ग्रहण किया और बाजार से आटा व शिमला मिर्च लाये। फिर पढ़ने के लिए बैठे। थोड़ी देर पढ़ाई के पश्चात भोजन, फिर नीचे उतरकर कुल्फी खाने गये। फिर वापस लौटकर भी वहीं करना पड़ा जो दिन भर होता है या इस फ्लैट की जो मुख्य विशेषता है, लेकिन यह गलत है इससे अपने आपको बचाना होगा, ऐसी बातें इससे पहले भी उठी। सावधान किया गया। मुझमें ही दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी है, इसके विषय में कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। पिछले कुछ दिनों से मेरे द्वारा पढ़ाई संबंधी बातें या कुछ अन्य बातों के लिए सिर्फ कन्फेस किया जा रहा है, जो कि सरासर गलत है। इस बात को लेकर तो तुम्हारा विश्वास मुझ पर से उठ जाएगा। खैर.. आज सबसे बड़ी बात यह हुई कि किसी भी मद में मेरे द्वारा एक आना भी खर्च नहीं हुआ। यहां तक की शाम की कुल्फी भी खिलाई मैंने, लेकिन सौजन्यकर्ता हमारे कलकत्ता वाले मित्र थे। अच्छा..... मंगलमयी रात्रि।
- नितेश

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