प्रिय दैनन्दिनी,
'लक्ष्मी चंचला होती है'... ऐं तुम सोचोगी कि मैं ये क्या बात कर रहा हूं शायद पैसा घट गया है... नहीं ऐसी बात नहीं है इस संदर्भ में एक बात ध्यान आयी थी उसका उल्लेख नीचे कर रहा हूं। वैसे आज दिन की शुरूआत पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार गन्नौर यात्रा, गुरू मां का आश्रम जिस स्थान पर है, से शुरू हुई, वहां पर संकल्प लेने के उद्देश्य से गये थे। यात्रा सफल सिद्ध हुई। एक बात यहां बताना चाहूंगा- आश्रम का शांत, सुरम्य, मनमोहक वातावरण मन को प्रभावित करने में सफल रहा। वापसी साढ़े बारह बजे तक हुई। दोपहर के भोजन के पश्चात निकट के शिव मंदिर में एक मित्र के साथ प्रसाद लेने गये, तुरंत खाकर गये थे अतः तत्क्षण प्रसाद लेना मुश्किल लग रहा था लेकिन मित्र महोदय उत्साह दिखा रहे थे। उनके उत्साह को ठंडा किया, जिसका अर्थ उन्होंने घर वापस लौटते वक्त समझा। शाम एक शाम की तरह बीती। सात बजे से पठन-पाठन का कार्यक्रम चला। फिर जल्द ही तुम्हारे सामने हाजिर हुआ। इसके पश्चात भोजन व उसके पश्चात निद्रा। अब तक तो इसके बाद के लिए यही कार्यक्रम है। वैसे एक बात- आज फ्लैट में हमारे मित्र के एक भ्राताश्री आए थे। एकदम शांत स्वभाव वाले। लेकिन हमारे उस मित्र व एक और ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपना असली परिचय देने में कोई कसर न छोड़ी। यही स्थिति हमारे नीचे की भी है, तो तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में लक्ष्मी टिकेगी, कभी नहीं। वे दो मित्र भी श्रीयुक्त है लेकिन क्या श्रीयुक्त होना सब कुछ होता है, प्रेम नहीं तो वह अपनी चंचलता दिखाएगी ही। शेष शुभ...।
- नितेश
'लक्ष्मी चंचला होती है'... ऐं तुम सोचोगी कि मैं ये क्या बात कर रहा हूं शायद पैसा घट गया है... नहीं ऐसी बात नहीं है इस संदर्भ में एक बात ध्यान आयी थी उसका उल्लेख नीचे कर रहा हूं। वैसे आज दिन की शुरूआत पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार गन्नौर यात्रा, गुरू मां का आश्रम जिस स्थान पर है, से शुरू हुई, वहां पर संकल्प लेने के उद्देश्य से गये थे। यात्रा सफल सिद्ध हुई। एक बात यहां बताना चाहूंगा- आश्रम का शांत, सुरम्य, मनमोहक वातावरण मन को प्रभावित करने में सफल रहा। वापसी साढ़े बारह बजे तक हुई। दोपहर के भोजन के पश्चात निकट के शिव मंदिर में एक मित्र के साथ प्रसाद लेने गये, तुरंत खाकर गये थे अतः तत्क्षण प्रसाद लेना मुश्किल लग रहा था लेकिन मित्र महोदय उत्साह दिखा रहे थे। उनके उत्साह को ठंडा किया, जिसका अर्थ उन्होंने घर वापस लौटते वक्त समझा। शाम एक शाम की तरह बीती। सात बजे से पठन-पाठन का कार्यक्रम चला। फिर जल्द ही तुम्हारे सामने हाजिर हुआ। इसके पश्चात भोजन व उसके पश्चात निद्रा। अब तक तो इसके बाद के लिए यही कार्यक्रम है। वैसे एक बात- आज फ्लैट में हमारे मित्र के एक भ्राताश्री आए थे। एकदम शांत स्वभाव वाले। लेकिन हमारे उस मित्र व एक और ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपना असली परिचय देने में कोई कसर न छोड़ी। यही स्थिति हमारे नीचे की भी है, तो तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में लक्ष्मी टिकेगी, कभी नहीं। वे दो मित्र भी श्रीयुक्त है लेकिन क्या श्रीयुक्त होना सब कुछ होता है, प्रेम नहीं तो वह अपनी चंचलता दिखाएगी ही। शेष शुभ...।
- नितेश
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