Wednesday, January 4, 2017

9 अक्टूबर 2001

प्रिय दैनन्दिनी,
                     प्रातःकाल में तीन बार बिछावन से आज उठे, लेकिन शारीरिक दर्द के कारण पुनः सो जाते थे। फिर भी किसी तरह उठकर शाखा जाना हुआ फिर दूध व सब्जी लेकर आए। पेट में अम्लता बढ़ी हुई लग रही थी, अतः मैंने पुदीन हरा लिया, उसके पश्चात कपड़ा धोने के बाद स्नान व पूजा-पाठ होने के बाद पेट-दर्द के कारण बिछावन पर लेटे रहे। घंटों लेटे रहे। इसी बीच टॉयलेट गये, जहां पेट दर्द के कारण का पता चला। शाम चार बजे तक आराम की ही मुद्रा में पड़े रहे, फिर पेपर-कटिंग एक मित्र के साथ किए। फिर बाजार से सामान लाना था, जो कि मित्रों के द्वारा ले आया गया। फिर आज मंगलवार था, हनुमान मंदिर गए। फिर रात में भोजन, विशेषकर जो बीमारी दूर करने के लिए बना था, करने के पश्चात ग्यारह बजे के करीब घर पर पापा से बात की फिर वापस लौटने के थोड़ी देर बाद मध्यरात्रि हो गई, फिर तुमसे संपर्क साधा। पूरा दिन एक डल दिन की तरह बीता। रह-रहकर एक गीत अपनी सच्चाई बता जाता, जिस गीत से हम पिछले महीने परिचित हुए- "सुख आते है, दुःख आते है, इन आते-जाते सुख-दुःख में हम मस्त रहते है, हम मस्त रहते है।" तो अभी स्थिति में मस्त रहने की कोशिश करते है, अब देखो कल ही पढ़ने के पश्चात जब मैं उठा तो बेंत की कुर्सी से एक कांटी निकली हुई थी जिससे कि मेरे दायें पैर में पीछे एक लंबा कट का निशान बन गया, उसका दर्द आज भी सता रहा है, माने स्थिति दुखत होते हुए भी मस्त है। दे रहा हूं कलम को विराम और आपको राम-राम।
- नितेश

No comments:

Post a Comment