Thursday, March 26, 2026

ध्यान और मॉडर्न सामाजिक व्यवस्था

 एक समय था जब ध्यान सिर्फ उनके लिये था जो संसार से ऊब कर वैरागी हो गये थे। अब उनके लिये संसार में कोई रस न था और इस वजह से वह सुख और दुख के खेल के बाहर किसी महाआनंद की तलाश में थे। 


संसार जैसा है, ऐसा ही रहेगा, यहाँ कोई समाधान किसी बात का नहीं है और इसे बदला नहीं जा सकता ऐसी मान्यता के चलते संसार से मुंह मोड़कर लोग संन्यासी जीवन स्वीकारते रहें हैं। 

कोई प्रेम में धोखा खाकर संन्यासी बन जाता और कोई धन खोकर! आज उन्हीं कारणों के चलते कम लोग ध्यान में उत्सुक होते है। और यह एक तरह से अच्छा भी है। लोग जीवन को फिर से बेहतर बनाने के मौके ढूंढते है। 

आज बहुत से विधायक कारणों से ध्यान में रुचि बनी है लोगों की। आज लोग ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर सके इस लिये ध्यान सिख रहें है, ज्यादा आनंदित रह सके इस लिए ध्यान सिख रहें है। धोखा खाकर ध्यान सीखने की जगह वें बेहतर इंसान बन के ज्यादा प्रेमपूर्ण बन सके इसलिये ध्यान सीख रहें है।

और यही कारण बड़ा भेद ला देता है पुराने तरह के लोगों की ध्यान में रुचि के बाबत और इन नये पोसिटिव लोगों की ध्यान में रुचि के बाबत। पुराना ध्यान रहस्यमय शक्तियों का और मोक्ष का वादा करता था पर आज ध्यान की ज्यादा वैज्ञानिक समझ पैदा हुई है वैज्ञानिक अनुसंधानों के चलते। सिलिकॉन वैली में भी ध्यान के प्रयोग होने लगे है। 

जीवन से भागने वाले पुराने प्रकार के लोग संसार में स्वार्थी थे और ध्यान को लेकर भी स्वार्थी थे। पहले वह संसार से स्वयं के लिये कुछ पाना चाहते थे और अब वह ध्यान या सन्यास के सहारे कुछ अलग स्वयं के लिए पाना चाहते रहें है। 

संसार पहले महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें सुख दिखाई पड़ता था। भ्रांति टुटुटे ही पुराना व्यक्ति अब अलग तरह के स्वार्थी व्यक्ति बन जाता था। उस अलग प्रकार के स्वार्थी व्यक्ति को हम संन्यासी कहते थे। 

यह और बात है कि ध्यान की सिद्धि के बाद वह दूसरों को ध्यान से पैदा हुई समझ देता था पर फिर भी उसके प्रवचनों में जीवन और संसार को लेकर विधायकता इतनी न थी। सन्यास का अर्थ था सब वस्तुओं का और रिश्तों का त्याग या उनसे अलिप्त हो जाना। एक संन्यासी जीवन जीना या बहुत ही कम आवश्यकता बनाकर संसार में संन्यासी जीवन जीना। 

ऐसे लोगों को संभालने के लिये भारत जैसे देश में व्यवस्था भी मौजूद थी और वह व्यवस्था आज भी मौजूद है भले ही उस व्यवस्था में काफी फर्क आया हो।  

पर आज का युग बिलकुल बदल गया है। हम पूंजीवादी व्यवस्था में जी रहें है। देखते ही देखते लोग अमीर बने है, सामान्य इंसान के हाथ में मोबाइल और इंटरनेट जैसी टेक्नोलॉजी आ चुकी है साथ में खुली है विशाल संभावनाओं का संसार।

टेक्नोलॉजी और विज्ञान ने जीवन के  पूंजीवादी व्यवस्था के साथ मिलकर बड़ी सारी संभवनाएं दी है। इस व्यवस्था में इंसान ज्यादा स्वतंत्रता अनुभव करता है पुराने रुढ़िवादी समाज के चुंगल से बाहर आकर। 

युवा पीढ़ी ज्यादा बेहतर ज़िंदगी के लिये गांवों से शहर की और बढ़ रही है। बड़े शहरों में स्त्री को ज्यादा स्वतंत्रता मिली है। जीवन जीने के लिये बेहतर संसाधनों की सुविधा है। एक रिश्ता टूटता है तो 10 नये रिश्ते खड़े होने की संभावना है। एक नौकरी से सालों चिपके रहने की जगह लोग 2-3 सालों में नौकरियां बदल लेते है। 

पर इस माहौल ने जो छीना है लोगो से वह है लोगों का लोगों से घनिष्ट रिश्ता, उनका फुरसत का समय, प्रकुर्ति की करीबी और दिया है तनाव और ज्यादातर लोगों के लिये कोल्हू के बैल जैसा जीवन। 

*आज का युवा मोक्ष और ईश्वर नहीं खोज रहा और अगर खोज रहा है तो वह आज का युवाचित नहीं है।*

आज के युवा ध्यान में रुचि लेने लगे है क्योंकि वह बेहतर जीवन जीना चाहते है। आज का युवा  योगा करता है तो उसके पीछे कारण अध्यात्म या मुक्ति नहीं बल्कि ज्यादा बेहतर और सुंदर शरीर और स्वास्थ्य है। 

पुराने गुरु शरीर तो मरने वाला है मौत तो आने वाली है ऐसी नकारात्मक भाषा में बात करते आएं है और आज की पीढ़ी को ऐसी बातों में कोई रस नहीं। भारत के अध्यात्म ने इस पीढ़ी को कुछ नहीं दिया, हम दरिद्र रहें, और कई मामलों में पिछड़ गये। 

पश्चिम के देशों ने समृद्धि पैदा कर ली, सुख सुविधा पैदा कर ली और दुख का कारण ईश्वर नहीं है हमारी आदिम सोच है यह साबित कर दिया। 

विकसित देशों में ईश्वर जैसी बातों में एक बड़े स्तर पर लोगों की रुचि कम हो गई है।  

21विं सदी का भारत भी उसी पश्चिम की सुख, सुविधा और व्यवस्था चाहता है। और क्यों न चाहें! 

कोई यह कह सकता है कि पश्चिम का समाज बड़ा तनाव ग्रस्त है। ज्यातर लोग पश्चिम का अर्थ अमरीका समझते है। अमरीका आदर्श देश बिल्कुल नहीं है। यूरोपीय देशों में अमरीका जैसी स्थिति नहीं है। अमरीका के एक बेल्ट में तो धार्मिक अंधविश्वास का बोल बाला है। हालांकि अमरीका को देश की जगह एक कंपनी माना जाने लगा है। अमरीका के आधिपत्य आम लोगों से ज्यादा बड़ी कंपनियों के पास है। इसे *कॉरपोरेट अमरीका* भी कहा जाता हैं।

पर यूरोपीय यूनियन के देश बेहतर जीवन स्तर और समृद्धि प्रदान करते है। वह तकनीकी व्यवस्था के स्तर पर और *सामाजिक स्वतंत्रता और व्यवस्था* के स्तर पर हम से करीब 200 साल आगे है। 

*यह बात और है कि कुछ लोग खुले में शौच जाने को स्वतंत्रता कह लें या रास्ते पर ट्रैफिक सिग्नल तोड़ ने को स्वतंत्रा कहें।* 

आज का युवा भारत छोड के विदेशों में रहना पसंद करता है। सैकड़ों में से काफी कम लोगों को भारत में वापस आने का मन है। कुछ लोग भारत में ज्यादा समृद्ध है बस और कानून खरीद सकते है इस वजह से इस देश में है। अगर अमरीका या यूरोप हर भारतीय के लिये वीसा फ्री कर दें तो इस देश में सिर्फ गरीब रह जायेंगे, जो प्लेन की टिकीट नहीं खरीद सकते और दूसरे वह अमीर रह जायेंगे जो इस देश के धन का सबसे ज्यादा हिस्सा रखते है। 

*भारत का एक वर्ग अभी भी महात्मा और संतो के चक्कर में फंसा पड़ा है।*

भारत एक दूसरा छोटा वर्ग मॉडर्न या बाहर से इम्पोर्ट की या कहें अमरीका से नई पैकेजिंग में ढली विद्यायें जैसी की रेकी, टैरो, प्राणिक हीलिंग, मंडला आर्ट, एक्सेस बार, शामनिक हीलिंग जैसी अल्टरनेटिव हीलिंग थेरपी को अध्यात्म समझ कर उपने आप को अध्यात्मिक पहचान दे रहा है। 

*एक बहुत ही छोटा समूह रमण, जे.कृषणामूर्ति या भारतीय उपनिषद जैसे शाश्त्रों को समझने की कोशिश करता हैै। ज्यादातर लोग भारत एक महान देश है इससे आगे कुछ बोल नहीं पाते है।उन्हें न उपनिषद समझ में आता है न भारत का विविध दर्शन।* 

*ज्यादातर लोगों को तो यह तक नहीं पता की हम कौनसी राजनैतिक विचारधारा या इकोनॉमिक पॉलिसी में जी रहें है। आम भारतीय का दूसरे विषयों में ज्ञान का स्तर काफी नीचे है। फेसबुक और इंस्टाग्राम लोगों का संसार बन चुका है।* 

पिछली सदी में आज़ादी के कुछ साल बाद ही बदलते हुए भारत में आचार्य रजनीश (ओशो) एक नये तरह का अध्यात्म लेकर आते है जो पुराने भारतीय अध्यात्म और नये पश्चिमी जीवन को जोड़ता हुआ दिखाई पड़ता है। 

उनके दर्शन में वैसा सन्यास नहीं है जो संसार छोड़ने की बात करता हो या किसी स्वर्ग कि तलाश में हो। उनका दर्शन न समझ पाने की वजह से वह बड़ी बदनामी के शिकार हुए।

उनका सन्यास जीवन को स्वीकार करता सन्यास है और ध्यान का अर्थ जीवन को अधिक गहराई से जीना है बजाय जीवन से पलायन करने के। हालाँकि उनके संन्यासीयों में आप को पुराने भारतीय चित वाले संन्यासी भी मिल जायेंगे जो मोक्ष या enligtenment के पीछे पड़े हो। इसका कारण यह है कि ओशो ने हर भारतीय संत जो उच्च दशा में थे उन के दर्शन को समझाने के लिये काफी प्रवचन दीये थे। उन्होंने पुराने भारतीय प्रज्ञा पुरषों के दर्शन को पूर्ण न्याय देने की कोशिश की थी। पर उनका स्वयं का दर्शन उन पुराने तरह के अध्यात्म से मेल नहीं खाता। 

वह ऐसे व्यक्ति को ध्यानी बनाने की बात करते है जो बिलकुल भौतीक वादी है। दूसरी तरह से कहें तो वह हर संन्यासी को संसार में खड़ा रहके संसार को अधिक सुंदर बनाने को कहते है। 

ओशो की बात इस लिये कई लोगों को खिचड़ी लगती है और वह कंफ्यूज रहते है या ओशो के खिलाफ हो जाते है।

हमारा मन इस तरह से चीजों को समझने का आदि नहीं है। वह ब्लेक एंड व्हाइट जवाब चाहता है। वह नास्तिक या आस्तिक, संसारी या संन्यासी, साधु और शैतान ऐसे सभी चीजों का वर्गीकरण करता आया है। वह द्वैत में अद्वैत का दर्शन नहीं कर पाता। 

ओशो एक नई असंभव दिखने वाली मानवता की शुरूआत भर है। इनके बगिया में आने वाले समय में वह फूल खिलेंगे जो विज्ञान और ध्यान का जोड़ होंगे, जो संसार और ध्यान का जोड़ होंगे। जो संसार और ध्यान को अलग कर के नहीं चलेंगे बल्की संसार को ही ध्यान करने का मौका बना लेंगे। 

तो आज के युवा चित को पुराने धरमों के या ओशो के वह पुराने धर्मग्रस्त अंधविश्वासी लोग आकर्षित नहीं कर पाते। एक प्रतिभाशाली युवा इनकी बातों में नहीं फंसता और फंस भी अगर जाता है तो जल्दी ही ऐसा लोगों का धार्मिक आडंबर खुल के सामने आ जाते है उनके सामने। 

ज़रूरत है अब ध्यान को वैज्ञानिक समझ के साथ साथ जीवन और उत्सव से जोड़ने की ताकि हम पश्चिमी विकास की अंधी दौड़ में न फंस जाये पर एक बेहतर समाज का मिलकर निर्माण करें जिसमें प्रकृति प्रेम और मानवता के प्रति प्रेम का जन्

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