अभी भी झिझक है, अभी भी हिचक है,
अभी भी झिझक है, अभी भी हिचक है।
ग्रुप को खुले दिन हो गए है पच्चीस,
इधर-उधर से जोड़कर मेंबर हो गए बत्तीस।
कुछ ने तो ग्रुप में मचा रखी है खूब धमा-चौकड़ी
उनको लगता है चालीस में मिल गयी दूसरी नौकरी।
कुछ है एकदम शांत, उन्हें लगता है दूसरे झाड़ रहे हेकड़ी,
साथ ही ग्रुप में देखते अनाप-शनाप संदेशों की लंबी लड़ी।
ऐ दोस्तों बात नहीं किए यूँ ही बीत गए है साल पच्चीस,
एक पीढ़ी बीत गयी, अब तो खोलो अपने दांत बत्तीस।
ठीक है लड़कपन की चूहल का होता है अपना मज़ा
अभी कौन सी उम्र बीत गयी, कौन दे रहा है सजा।
फुर्सत मिले तो जमकर बातें करो और रहो हमेशा बिंदास
हिचक दूर करो, झिझक दूर करो क्योंकि ये ग्रुप है ख़ास।
-- स्वरचित
*******
विरचित...

सुंदर कविता, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है-_*
_ख्वाहिश नहीं मुझे_
_मशहूर होने की,"_
_आप मुझे पहचानते हो_
_बस इतना ही काफी है।_
_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा जाना मुझे,_
_जिसकी जितनी जरूरत थी_
_उसने उतना ही पहचाना मुझे!_
_जिन्दगी का फलसफा भी_
_कितना अजीब है,_
_शामें कटती नहीं और_
_साल गुजरते चले जा रहे हैं!_
_एक अजीब सी_
_'दौड़' है ये जिन्दगी,_
_जीत जाओ तो कई_
_अपने पीछे छूट जाते हैं और_
_हार जाओ तो_
_अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं!_
_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अक्सर,_
_मुझे अपनी_
_औकात अच्छी लगती है।_
_मैंने समंदर से_
_सीखा है जीने का सलीका,_
_चुपचाप से बहना और_
_अपनी मौज में रहना।_
_ऐसा नहीं कि मुझमें_
_कोई ऐब नहीं है,_
_पर सच कहता हूँ_
_मुझमें कोई फरेब नहीं है।_
_जल जाते हैं मेरे अंदाज से_
_मेरे दुश्मन,_
_एक मुद्दत से मैंने_
_न तो मोहब्बत बदली_
_और न ही दोस्त बदले हैं।_
_एक घड़ी खरीदकर_
_हाथ में क्या बाँध ली,_
_वक्त पीछे ही_
_पड़ गया मेरे!_
_सोचा था घर बनाकर_
_बैठूँगा सुकून से,_
_पर घर की जरूरतों ने_
_मुसाफिर बना डाला मुझे!_
_सुकून की बात मत कर_
_ऐ गालिब,_
_बचपन वाला इतवार_
_अब नहीं आता!_
_जीवन की भागदौड़ में_
_क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?_
_हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
_आम हो जाती है!_
_एक सबेरा था_
_जब हँसकर उठते थे हम,_
_और आज कई बार बिना मुस्कुराए_
_ही शाम हो जाती है!_
_कितने दूर निकल गए_
_रिश्तों को निभाते-निभाते,_
_खुद को खो दिया हमने_
_अपनों को पाते-पाते।_
_लोग कहते हैं_
_हम मुस्कुराते बहुत हैं,_
_और हम थक गए_
_दर्द छुपाते-छुपाते!_
_खुश हूँ और सबको_
_खुश रखता हूँ,_
_लापरवाह हूँ ख़ुद के लिए_
_मगर सबकी परवाह करता हूँ।_
_मालूम है_
_कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी_
_कुछ अनमोल लोगों से_
_रिश्ते रखता हूँ।_






सिर्फ मोबाइल को ही..
पता है उसके..
मालिक का
चरित्र कैसा है...



जिदंगी के खुबसुरत सफर में न जाने कितने लोग मिलते हैं
कुछ हमारा फायदा उठाते हैं ,
तो कुछ हमें सहारा देते हैं
फर्क बस इतना है कि..
फायदा उठाने वाले दिमाग में रहते हैं
और सहारा देने वाले हंमेशा दिल में बसते हैं
सुप्रभात 
"ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनका दूसरा मिसरा इतना मशहूर हुआ कि लोग पहले मिसरे को तो भूल ही गये। ऐसे ही चन्द उधारण यहाँ पेश हैं:
"ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है,
*वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"
*- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़*
"भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया,
*ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*
*- माधव राम जौहर*
"चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
*आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*
*- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी*
"दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से,
*इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"*
*- महताब राय ताबां*
"ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम,
*रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"*
*- क़मर बदायुनी*
"क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने दो,
*ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।"*
*- मियाँ दाद ख़ां सय्याह*
'मीर' अमदन भी कोई मरता है,
*जान है तो जहान है प्यारे।"*
*- मीर तक़ी मीर*
"शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली,
*रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।"*
*- जलील मानिकपूरी*
"शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी,
*कोई पत्थर से न मारे मेंरे दीवाने को।"*
*- शैख़ तुराब अली क़लंदर काकोरवी*
"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
*लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।"*
*- मुज़फ़्फ़र रज़्मी*"
एक बहुत भावुक कविता।

*कुछ रह तो नहीं गया ?*
*तीन* महीने के
बच्चे को दाई के पास
रखकर जॉब पर
जाने वाली माँ को
दाई ने पूछा...
"कुछ रह तो
नहीं गया...?
पर्स, चाबी
सब ले लिया ना...?"
अब वो
कैसे हाँ कहे...
पैसे के पीछे
भागते भागते...
सब कुछ पाने की
ख्वाईश में
वो जिसके लिये
सब कुछ कर रही है,
*वह ही रह गया है...!*
*शादी* में
दुल्हन को बिदा
करते ही शादी का
हॉल खाली करते
हुए दुल्हन की
बुआ ने पूछा...
"भैया, कुछ रह
तो नहीं गया ना...?
चेक करो ठीक से...!"
बाप चेक करने
गया तो दुल्हन के
रूम में कुछ फूल
सूखे पड़े थे।
सब कुछ तो
पीछे रह गया...
25 साल जो नाम
लेकर जिसको
आवाज देता था
लाड़ से...
वो नाम पीछे
रह गया और
उस नाम के आगे
गर्व से जो नाम
लगाता था,
वो नाम भी पीछे
रह गया अब...
"भैया, देखा...?
कुछ पीछे तो नहीं रह गया ?"
बुआ के इस
सवाल पर आँखों
में आये आंसू
छुपाते बाप जुबाँ
से तो नहीं बोला....
पर दिल में
एक ही आवाज थी...
*सब कुछ तो यहीं रह गया...!*
*बड़ी* तमन्नाओं
के साथ बेटे को
पढ़ाई के लिए
विदेश भेजा था
और वह पढ़कर
वहीं सैटल हो गया...
पौत्र जन्म पर
बमुश्किल 3 माह
का वीजा मिला था
और चलते वक्त
बेटे ने प्रश्न किया...
"सब कुछ चेक
कर लिया ना...?
कुछ रह तो
नहीं गया...?"
क्या जबाब देते कि...
*अब छूटने को*
*बचा ही क्या है...!*
*सेवानिवृत्ति* की शाम
पी.ए. ने याद दिलाया...
"चेक कर लें सर...!
कुछ रह तो नहीं गया...? "
थोड़ा रूका
और सोचा कि
पूरी जिन्दगी तो
यहीं आने-जाने में
बीत गई...
*अब और क्या रह गया होगा...?*

*श्मशान* से
लौटते वक्त बेटे ने
एक बार फिर से
गर्दन घुमाई
एक बार पीछे
देखने के लिए...
पिता की चिता की
सुलगती आग देखकर
मन भर आया...
भागते हुए गया
पिता के चेहरे की
झलक तलाशने की
असफल कोशिश की
और वापिस लौट आया।
दोस्त ने पूछा...
"कुछ रह गया था क्या...?"
भरी आँखों से बोला...
*नहीं कुछ भी नहीं रहा अब...*
*और जो कुछ भी रह गया है...*
*वह सदा मेरे साथ रहेगा...!*
*एक* बार
समय निकालकर
सोचें, शायद...
पुराना समय
याद आ जाए,
आंखें भर आएं
और...
*आज को जी भर जीने का*
*मकसद मिल जाए...!*
सभी दोस्तों से
ये ही बोलना
चाहता हूँ...
*यारों क्या पता कब*
*इस जीवन की शाम हो जाये...!*
इससे पहले कि
ऐसा हो सब को
गले लगा लो,
दो प्यार भरी
बातें कर लो...
*ताकि कुछ छूट न जाये...!!!*
नई राह है, नई उमंग है,
अब विलम्ब तनिक भी मत करना
ऐ पथिक! ये तेरी नई सुबह है!
जो कल हुआ, उसे भूलना मत,
जो भूल हुई हैं तुमसे
ये ठान ले तू अपने मन में
आज तुझे सुधारना है
ऐ पथिक.........
जितने रंग सजाने है सजा लो
अपने इस जीवन मे,
देर नहीं अब करना तुम
वक्त ने करवट ले ली है
ऐ पथिक.......
कुछ कर जाने की
सोच लो तुम,
कुछ पा लेने की सोच लो तुम,
इतनी गांठ बांध लेना
किसी से अब नहीं हारना है
ऐ पथिक..........
स्वागत कर तू अब
अपनी इस नई सुबह का,
जो चाहे तू अब कर ले
एहसास तू कर अब
खुलकर हँसने का
ऐ पथिक! ये तेरी
नई सुबह है!!!!!!
अच्छे लोगों की इज्जत
कभी कम नहीं होती
सोने के सौ टुकड़े करो
फिर भी कीमत
कम नहीं होती
भूल होना "प्रकृत्ति" है
मान लेना "संस्कृति" है
और उसे सुधार लेना "प्रगति" है.
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