Thursday, March 11, 2010

भारत में 'न्यू सिनेमा' की शुरूआत 'भुवन सोम' से

( जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान शनिवार को फिल्म एप्रीशिएसन की क्लास होती थी, उसी में पहली फिल्म भुवन सोम दिखाई गयी थी। उस पर एक आलेख लिख कर लाना था। हमने लिखा, लेकिन शिक्षक महोदय को फिल्म के टेक्नीकल आस्पेक्टस पर टिप्पणी चाहिए थी, जिसे हम नहीं कर पाए थे।)


भारतीय सिने जगत में 'न्यू सिनेमा' की शुरूआत करने वाली फिल्म भुवन सोम वाकई एक कुशल निर्देशन में बनने वाली फिल्म है। मृणाल सेन ने जहाँ इस फिल्म से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी, वहीं हिन्दी सिनेमा को एक नया आयाम प्रदान किया। फिल्म की एक और विशेषता यह है कि निर्देशक मृणाल सेन, कैमरा मैन के के महाजन, अभिनेता उत्पल दत्त व अभिनेत्री सुहासिनी मुले सभी ने पहली बार हिन्दी फिल्म के लिए काम किया और सभी के कुशल कार्य व अभिनय ने इसे एक मील का पत्थर बना दिया।

भय- फिल्म का केंद्र-बिन्दु, जिसका एहसास होने पर भुवन सोम, जिसने अपने चारों ओर अनुशासन की कड़ी दुनिया बना रखी थी, जीवन की सच्चाई से वाकिफ हो जाते है। रेत की वादियों के बीच जब भुवन सोम शौकिया तौर पर शिकार करने जाते है तो वहाँ पर निशाना साधने के क्रम में एक पक्षी बंदूक की गोली से न घायल होकर उसकी आवाज से घायल हो जाता है, तो उसे इस बात का एहसास होता है कि भय से आम जीवन में बातें बिगड़ती ही है और इसके बाद फिल्म में नायक एक स्वच्छंद और उन्मुक्त जीवन जीने को आतुर दिखायी देता है।

फिल्म की एक कड़ी की बात न की जाए तो चर्चा अधूरी रह जाएगी। वह है- भ्रष्टाचार, जिसे कि हम सदियों से अपने समाज में पाते है। यहाँ पर चाय-पानी शब्द का उपयोग किया गया है, जिसके विषय में अभिनेत्री बड़ी मासूमियत से पूछती है कि क्या चाय-पानी का पैसा लेना गलत है क्या इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि भ्रष्टाचार के रूपों से समाज परिचित होते हुए भी अनजान बना रहता है। यहाँ निर्देशक समाज के भ्रष्ट आचरण को दिखाता तो है, लेकिन उसका समाधान नहीं ढूँढ़ता है।



अंततः यह कहा जा सकता है कि जीवन की वास्तविक सच्चाइयों को एक सूत्र में पिरोकर निर्देशक ने इस चलचित्र को एक उत्कृष्टता प्रदान की है।

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